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  Jadeed Markaz
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उत्तर प्रदेश असम्बली एलक्शन आए तो मुस्लिम वोटो के सौदागरों ने सजा ली अपनी-अपनी दुकाने
                             कौन हैं अहमद बुखारी

हिसाम सिद्दीकी
लखनऊ!
उत्तर प्रदेश के मुसलमान किसे वोट दें और किस पार्टी की हिमायत करें इसका फैसला करने वाले दिल्ली वक्फ बोर्ड की मामूली तंख्वाह पर शाहजहानी मस्जिद में नमाज पढ़ाने वाले अहमद बुखारी कौन होते हैं। यह वह सवाल है जो आजकल बलिया, देवरिया से सहारनपुर, मेरठ और बांदा, इलाहाबाद, इटावा से लखीमपुर तक के बेश्तर (अधिकांश) मुसलमानों की जुबान पर है। बड़ी तादाद में मुसलमानों का तो यहां तक कहना है कि अहमद बुखारी जैसे सौदागर कहे जाने वाले शख्स के समाजवादी पार्टी के हक में ख्ुाल कर सामने आ जाने की वजह से कई हल्कों के मुसलमानों ने अब समाजवादी पार्टी के बजाय कांग्रेस को वोट देने का इरादा कर लिया है। किसी की भी समझ में नही आ रहा है कि मुसलमानों में समाजवादी पार्टी के सदर मुलायम सिंह यादव की खोई हुई सियासी जमीन खुद व खुद उन्हें वापस मिल रही थी ऐसे वक्त में अहमद बुखारी जैसे शख्स को अपने साथ लाने की गलती मुलायम सिंह यादव ने क्यों कर दी। मुसलमानों में अहमद बुखारी से नफरत की वैसे तो कई वजहें हैं, लेकिन ज्यादा नाराजगी इस लिए भी हो गई कि कांग्रेस सरकार ने पिछड़े मुसलमानों को साढ़े चार फीसद रिजर्वेशन देने का फैसला किया तो बुखारी भी आरएसएस और बीजेपी की जुबान बोलने लगे। लखनऊ में समाजवादी पार्टी के दफ्तर में मुलायम सिंह यादव की बगल में बैठ कर अहमद बुखारी ने भी उमा भारती की जुबान बोलते हुए कह दिया कि बैकवर्ड तबकों को मिले सत्ताइस फीसद रिजर्वेशन में से साढ़े चार फीसद मुसलमानों को दिए जाने से बैकवर्ड हिन्दुओं में मुसलमानों के लिए नफरत का माहौल पैदा होगा। इस किस्म की घटिया बात कहते हुए अहमद बुखारी को यह भी ख्याल नहीं रहा कि सत्ताइस फीसद रिजर्वेशन जिन पिछड़े तबकों को दिया गया था उनमें सिर्फ हिन्दू बैकवर्ड नहीं मुस्लिम बैकवर्ड भी शामिल हैं। बाइस सालों से सत्ताइस फीसद बैकवर्ड रिजर्वेशन में पिछड़े मुसलमानों का हक मारा जा रहा है। कांग्रेस ने साढ़े चार फीसद रिजर्वेशन मुसलमानों के लिए यकीनी बनाने का फैसला कराया। आम मुसलमान इस फैसले से इसलिए खुश है कि कहीं कुछ शुरूआत तो हुई अभी तक तो कोई लीडर मुस्लिम रिजर्वेशन का नाम तक लेना पसंद नहीं करता था। अब मुसलमानों को रिजर्वेशन मिलने का रास्ता साफ हुआ है तो महज कांग्रेस की मुखालिफत करने की गरज से अहमद बुखारी भी आरएसएस और बीजेपी के साथ खड़े नजर आने लगे।

उत्तर प्रदेश के ही नहीं मुल्क के किसी भी कोने के मुसलमान वोट देने के मामले में बुखारी जैसों की बातों पर गौर नहीं करते। वजह यह है कि अहमद बुखारी का कुन्बा मामूली फायदे के लिए अपनी वफादारी तब्दील करता रहता है। वैसे तो इस कुन्बे ने मुस्लिम वोटो की ठेकेदारी करने की कोशिशें इमर्जेंसी के बाद सन् उन्नीस सौ सतत्तर में हुए लोकसभा एलक्शन से ही शुरू कर दी थी लेकिन गुजिश्ता कई एलक्शनों मंे बार-बार अलग-अलग सियासी पार्टियों के साथ खड़े होकर बुखारी कुन्बे ने अपनी साख पूरी तरह खत्म कर ली। देा हजार चार के एलक्शन में जब बीजेपी ‘‘इंडिया शइनिंग’’ और ‘‘फील गुड’’ जैसे नारों के समन्दर में गोते लगा रही थी तो उस वक्त अहमद बुखारी बीजेपी लीडर और आरएसएस के सीनियर स्वयं सेवक पंडित अटल बिहारी वाजपेयी के कदमों में पड़े थे। वह मुसलमानों से अपील कर रहे थे कि वाजपेयी बहुत अच्छे इंसान है इसलिए उन्हें सरकार बनाने का एक मौका और दिया जाना चाहिए। उसी दौरान अहमद बुखारी के एक भाई मुंबई में शिवसेना के लिए काम कर रहे थे। सन् बाननवे में संघियों ने बाबरी मस्जिद शहीद करके मुल्क के मुसलमानों की तबाही और दहशतगर्दी का रास्ता साफ किया। उसके बाद अगर खुद को मुसलमान कहने वाला कोई भी शख्स बीजेपी के साथ खड़ा नजर आता है तो उसे मुसलमान कहना भी गुनाह है। उत्तर प्रदेश असम्बली के पिछले एलक्शन में अहमद बुखारी अपनी अलग पार्टी बना कर उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान में उतरे थे उन्हें और उनके खड़े किए हुए उम्मीदवारों की तरफ किसी मुसलमान ने देखा तक नहीं। फिर दो हजार नौ का लोकसभा एलक्शन आया तो अहमद बुखारी ने बीजेपी व कांग्रेस समेत कई छोटी बड़ी सियासी पार्टियों को पैगाम भेजा कि वह उस पार्टी के लिए काम करने को तैयार बैठे हैं। अजीब बात है कि लोकसभा एलक्शन में किसी भी सियासी पार्टी ने उन्हें घास नहीं डाली। अब गुजिश्ता चार पांच महीनों से समाजवादी पार्टी के सदर मुलायम सिंह यादव को अचानक बुखारी की याद सताने लगी। सड़ी मछली की तरह अलग-थलग पड़े अहमद बुखारी को तो किसी का इंतजार ही था। मुलायम के मिलने से उनके अन्दर जैसे आक्सीजन ही भर गई। सबसे पहले तो उन्होंने सहारनपुर जिले के बेहट असम्बली हल्के से अपने दामाद मोहम्मद उमर खां को समाजवादी पार्टी का उम्मीदवार बनवा लिया उसी के बाद लखनऊ पहुंच कर मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी की हिमायत करने का फरमान भी मुसलमानों को सुना दिया। बहुत कम लोगों को ख्याल होगा कि सन् छियाननवे में बुखारी खानदान समाजवादी पार्टी के साथ था।

अहमद बुखारी हों या उनके मरहूम वालिद मौलाना अब्दुल्लाह बुखारी इन लोगों ने जब-जब किसी सियासी पार्टी या उम्मीदवार की हिमायत की उस पार्टी का बेडा गर्क हुआ और जिस किसी उम्मीदवार की मुखालिफत की वह कामयाब रहा है। सन् नवासी में जनता दल और विश्वनाथ प्रताप सिंह की लहर के वक्त भी बुखारियों ने कांग्रेस को हराने का एलान किया था। दिल्ली की सभी लोकसभा सीटों पर कांग्रेस हारी थी सिर्फ एक बुखारी के गढ़ वाली चांदनी चैक सीट से कांग्रेस के जय प्रकाश अग्रवाल जीते थे। इसी तरह जामा मस्जिद इलाके की मटियामहल असम्बली सीट पर बुखारियों की सख्त मुखालिफत के बावजूद शोएब इकबाल बार-बार जीत कर असम्बली पहुंचते हैं। बुखारी कुन्बा चालाक भी बहुत है। उन्हें अच्छी तरह दिख रहा है कि इस बार उत्तर प्रदेश असम्बली एलक्शन में सियासी हवा समाजवादी पार्टी के हक में चल रही है तो फौरन उन्होंने चढ़ते सूरज को सलाम करना शुरू कर दिया।

महज कांग्रेस की मुखालिफत करने और मुलायम सिंह यादव की खुशामद करने के चक्कर में बुखारी ने मुस्लिम रिजर्वेशन की मुखालिफत का गुनाह किया है उन्होने कहा कि इस्लाम में छोटे बड़े, अगडे पिछड़े जैसे तबके होते ही नहीं है। इसलिए कांगे्रस ने बैकवर्ड मुसलमानों को साढ़े चार फीसद रिजर्वेशन देकर मुसलमानों में एख्तलाफ (फूट) डालने और मुल्क के पिछड़े तबकों में मुसलमानों के लिए नफरत पैदा करने का काम कांग्रेस पार्टी ने किया है। इस किस्म का बयान देते वक्त बुखारी भूल गए कि इस्लाम में तो छोटे बड़े, अगड़े पिछड़े का कोई तसव्वुर ही नहीं है, लेकिन मुस्लिम मआशरे (समाज) में जात-पात, अगड़े पिछड़े, शोरफा व रजला की लानत काफी गहरी जड़े पकड़े हुए है। अब चूंकि खुद बुखारी सैयद है इसलिए उन्हें किसी बुनकर मुसलमान के दर्द का एहसास भी नहीं होता है। शायद इसीलिए मुलायम सिंह यादव के एक और खुशामदी आजम खां ने बुखारी के बयान पर एतराज जाहिर करते हुए कहा कि रिजर्वेशन एक सियासी मामला है बुखारी जैसे मोलवियों और पंडितों को इस मसले में दखल नहीं देना चाहिए। कुल मिलाकर तस्वीर की हकीकत यही है कि अहमद बुखारी जैसों के फरमान और अपीलों का आम मुसलमानों पर कोई असर नहीं पड़ता है न इस बार पडेगा।

Jan 29-Feb 4

कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आरएलडी की मिलीजुली हुकूमत बनने का इमकान बीएसपी, बीजेपी बहुत पीछे
यूपी एलक्शन की तस्वीर साफ

हिसाम सिद्दीकी
लखनऊ!
उत्तर प्रदेश असम्बली इंतखाबात (चुनाव) की अभी पहले मरहले की पोलिंग भी नहीं हुई है लेकिन मुख्तलिफ जिलों से मिलने वाली इत्तेलाआत के मुताबिक जिस किस्म के नतीजे आने की उम्मीद है उससे यह बात तकरीबन तय हो चुकी है कि अगली हुकूमत कांगे्रस, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल की मिलीजुली ही होगी। बहुजन समाज पार्टी और बीजेपी को इतनी सीटें मिलने की भी उम्मीद नहीं है कि वह मिलकर अगली सरकार बना सकें। चूंकि अट्ठाइस जनवरी से पोल सर्वे पर पाबंदी लग रही है जो एलक्शन खत्म होने तक जारी रहेगी इसलिए हम अपने काराईन (पाठकों) के लिए इसी हफ्ते यह खबर शाया कर रहे हैं। जिलों से जिस तरह की खबरें मिली है उसके मुताबिक समाजवादी पार्टी को डेढ़ सौ से एक सौ सत्तर (150 से 170) तक, कांग्रेस को साठ से अस्सी (60 से 80), बहुजन समाज पार्टी को सत्तर से नब्बे (70 से 90), बीजेपी को पैंतालीस से साठ (45 से 60) सीटें और राष्ट्रीय लोकदल को अट्ठारह से चैबीस (18 से 24) सीटें मिलने की उम्मीद है। पच्छिमी उत्तर प्रदेश में सहारनपुर, मेरठ से बरेली तक एक सौ सैंतीस असम्बली सीटों में मुसलमानों और सवर्णों का रूजहान कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल की तरफ है। इसके बावजूद कि देवबंद असम्बली हलके को अभी से मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी के हक में जाते हुए बताया गया है। भारतीय जनता पार्टी को भी पच्छिमी उत्तर प्रदेश से ही ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है।

मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी को वैसे तो प्रदेश के हर कोने से अच्छे नतीजों की उम्मीद है। लेकिन सेंट्रल यूपी और पूर्वी उत्तर प्रदेश से ही सबसे ज्यादा सीटें आने की तवक्को (संभावना) है। मसलन आजमगढ़ डिवीजन में इक्कीस असम्बली हलके हैं जिनमें सोलह तक मुलायम सिंह की झोली में जा सकते हैं। इस डिवीजन में बीजेपी को दो, बीएसपी को दो सीटें मिलने की उम्मीद है और एक सीट पर मुख्तार अंसारी जीत सकते हैं।

बहुजन समाज पार्टी को सबसे बड़ा नुक्सान बिजनौर, हरदोई, आजमगढ़ और बंुदेलखण्ड के सभी जिलों में होता दिख रहा है। 2007 के एलक्शन में बिजनौर की सात की सातो सीटों पर मायावती की बहुजन समाज पार्टी जीती थी। इस बार अगर एक भी जीत जाए तो यह बड़ी कामयाबी होगी। इसी तरह हरदोई की नौ में से आठ सीटें बहुजन समाज पार्टी जीती थी। एक सीट नरेश अग्रवाल के बेटे ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीती थी बाद में वह भी बहुजन समाजपार्टी में शामिल हो गई थी। इस बार नौ में से सिर्फ तीन सीटें बीएसपी को मिलने की उम्मीद है। यही हाल बुंदेलखण्ड का हो रहा है। राजधानी लखनऊ में पिछली बार सरोजनीनगर मलिहाबाद और महोना तीन सीटें बीएसपी जीती थी। डीलिमिटेशन के बाद लखनऊ में नौ सीटें हो गई हैं। उनमें बमुश्किल एक सीट भी मिल जाए तो गनीमत है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस जनरल सेक्रेटरी राहुल ने दिन-रात मेहनत करके और एग्रेसिव मुहिम चलाकर कांग्रेस को सियासी एतबार से हर कोने में जिंदा कर दिया, वह जहां जाते हैं बड़ी तादाद में अवाम उन्हें सुनने आते हंै। नौजवानों पर उनका अच्छा असर दिख रहा है। लेकिन राहुल के बाद पार्टी में कोई कुछ नहीं करता। पहले से ही बड़े पैमाने पर गु्रपबाजी थी, काम ना करने वाले कांग्रेसियों को अब एक बहाना बाहरी उम्मीदवारों का मिल गया है। नतीजा यह कि अमली तौर पर पूरी पार्टी आपसी गु्रपबाजी में फंसकर अपने ही उम्मीदवारों को हराने में लग गई है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी की सदर डाक्टर रीता बहुगुणा जोशी लखनऊ कैंट से एलक्शन लड़ रही है तो कांग्रेस का एक मजबूत गु्रप पार्टी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी में शामिल हुए अखिलेश दास की मदद से उन्हें हराने में लगा है। बाराबंकी से गोरखपुर तक बेश्तर (अधिकांश) उम्मीदवार मरकजी स्टील मिनिस्टर बेनी वर्मा की पसंद के हैं तो पार्टी के पुराने लोग इस ख्याल से उन्हें हराने में लगे हैं कि अगर बेनी वर्मा की पसंद के उम्मीदवार ज्यादा जीत जाते हैं तो पहले से ही पार्टी में मजबूत हो चुके बेनी वर्मा पार्टी पर पूरी तरह काबिज हो जाएंगे। भारतीय जनता पार्टी सियासी एतबार से पहले से ही काफी कमजोर है। पार्टी के तमाम रियासती लीडरान को नजरअंदाज करके किसी जमाने में फायर ब्रांड कही जाने वाली उमा भारती को उत्तर प्रदेश एलक्शन की बागडोर सौंपी गई। उन्हें बुंदेलखण्ड के चरखारी असम्बली हलके से पार्टी का उम्मीदवार भी बना दिया गया। लेकिन उमा भारती उत्तर प्रदेश में कोई असर पैदा नहीं कर पा रही हैं। पार्टी हाईकमान का यह ख्याल था कि शायद उमा भारती के जरिए पार्टी बैकवर्ड वोट इकट्ठा कर लेगी लेकिन ऐसा होते दिखता नहीं है। अव्वल तो बैकवर्ड वोट कई जगह तकसीम हो चुका है दूसरे बीजेपी के सीनियर कहे जाने वाले बैकवर्ड लीडर ओमप्रकाश सिंह, विनय कटियार, पे्रमलता कटियार और रामकुमार वर्मा वगैरह की पूरी ताकत लगी हुई है कि उमा भारती अपने मकसद में कामयाब ना हो सकें क्योंकि अगर वह कामयाब होकर उत्तर प्रदेश में जम गई तो प्रदेश के बैकवर्ड बीजेपी लीडरों की सियासत ही खत्म हो जाएगी। बीजेपी के सामने दूसरा बड़ा मसला यह है कि उत्तर प्रदेश का सवर्ण खुसूसन ब्राहमण वोटर जो एक जमाने में बीजेपी की रीढ़ की हड्डी बन गया था धीरे-धीरे वह सब छिटक चुका है। अब बीजेपी जितना बैकवर्ड वोट का लालच दिखा रही है सवर्ण वोटर उससे और दूर होता जा रहा है। उमा भारती चरखारी से भले ही एलक्शन जीत जाएं लेकिन उन्हें जरूरत से ज्यादा तरजीह दिए जाने की वजह से उनसे जितना फायदा हो रहा है उससे कहीं ज्यादा नुक्सान सवर्णों में होता दिख रहा है। उमा भारती के जरिए जिन लोध बिरादरी के वोटो को बीजेपी से जोड़ने की कोशिश हो रही है उसी बिरादरी के सबसे मजबूत लीडर कल्याण सिंह है जो अपनी अलग पार्टी बनाकर बीजेपी को गहरे गड्डे में दफन करने के लिए कोशां है।

Jan 22-28

गुजरात हाईकोर्ट ने मोदी हुकूमत की कारगुजारियों को जम्हूरियत मुखालिफ करार देते हुए सख्त फटकार लगाई
लोकायुक्त से बच नहीं सकेंगे मोदी

हिसाम सिद्दीकी
अहमदाबाद!
गुजरात हाईकोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इंसानियत दुश्मन वजीर-ए-आला नरेन्द्र मोदी सरकार की कारगुजारियों को जम्हूरियत (लोकतंत्र) मुखालिफ करार देते हुए कहा है कि ऐसी कारगुजारियों से अंदाजा लगता है कि जम्हूरियत में कितनी गिरावट आ चुकी है। अदालत ने कहा कि गवर्नर के जरिए लोकायुक्त की तकर्रूरी (नियुक्ति) के सिलसिले में गुजरात हुकूमत की जानिब से आर्डीनेंस का जारी ना होना एक तरह से दहशतगर्दी जैसी हरकत है। नरेन्द्र मोदी गुजरात में 2002 के पहले से वजीर-ए-आला है। गुजिश्ता आठ सालों से रियासत में लोकायुक्त नहीं है क्योंकि मोदी को खौफ है कि अगर कोई लोकायुक्त बन गया तो वह मोदी की बेईमानियों का पर्दा फाश कर देगा। बार-बार कहने के बावजूद जब मोदी ने लोकायुक्त मुकर्रर करने पर रजामंदी जाहिर नहीं की तो गवर्नर कमला बेनीवाल ने हाईकोर्ट के रिटायर जस्टिस आर.ए.मेहता को लोकायुक्त की हैसियत से मुकर्रर कर दिया। नरेन्द्र मोदी और उनकी हुकूमत ने गवर्नर के आर्डर के मुताबिक आर्डिंनेस जारी करने के बजाए गवर्नर के आर्डर के खिलाफ हाईकोर्ट में रिट दायर कर दी। इस मामले की सुनवाई करने वाली तीन जजों की बेंच में शामिल जस्टिस वी.एम.सहाय और जस्टिस अकील कुरैशी ने मोदी हुकूमत के खिलाफ फैसला दिया लेकिन एक जज जस्टिस सोनिया गोकानी ने मोदी हुकूमत की तरफदारी की। अब मोदी हुकूमत ने सुप्रीम कोर्ट जाने का एलान किया है।

नरेन्द्र मोदी हुकूमत गुजरात में अब तक की सबसे बेईमान फिरकापरस्त हुकूमत बताई जाती है। मोदी को इस बात का खौफ है कि लोकायुक्त बन जाने के बाद उनकी बेईमानियां और फिरकापरस्ती पकड़ में आ सकती है। गुजरात हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद मोदी तो खामोश रहे लेकिन उनके तर्जुमान जयनरायण व्यास ने एलान किया कि सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएगी। उद्दर दिल्ली में मोदी के वकील और राज्य सभा में लीडर आफ अपोजीशन अरूण जेटली इस फैसले पर इतने परेशान हो गए कि उन्होंने इसे मुल्क के फेडरल सिस्टम के खिलाफ ही करार दे दिया और अपनी तशरीह (व्याख्या) गढते हुए कहा कि चूंकि गवर्नर मरकजी हुकूमत का नुमाइंदा होता है इसलिए उसकी जानिब से मुकर्रर किया गया लोकायुक्त भी एक तरह से मरकजी हुकूमत का नुमाइंदा हो गया और इस तरह की तकर्रूरी (नियुक्ति) इन्डायरेक्ट तरीके से मरकजी हुकूमत की ही मानी जाएगी।

लोकपाल और लोकायुक्त की तकर्रूरी के बहाने ईमानदारी का ड्रामा करने वाले अन्ना हजारे और उनकी चैकड़ी ने भी गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के बाद मुजरिमाना खामोशी अख्तियार कर ली। यह लोग कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हुए। हाई कोर्ट ने जिस तरह के कमेंट नरेन्द्र मोदी और उनकी हुकूमत पर किए उसके बावजूद अन्ना और उनकी चैकड़ी की खामोशी और अरूण जेटली की दलील को बेशर्मी ही कहा जाना चाहिए। जस्टिस वी.एम.सहाय ने यह भी कहा कि लोकायुक्त जैसा इदारा सरकारी अफसरों की बेईमानियों से लड़ रहे लोगों के लिए उम्मीद की किरन है। मुल्क में फैली बेईमानियों से लड़ाई में आम लोगों को ताकत मिलना जम्हूरियत की नई लहर है क्योंकि बेईमानी से पाक मआशरा (समाज) आज के दौर की सख्त जरूरत है। खबर लिखे जाने तक इस फैसले पर खुद नरेन्द्र मोदी समेत बीजेपी के तमाम लीडरान कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हुए अकेले अरूण जेटली ने एक अजीब ओ गरीब दलील पेश की।

गुजरात में गुजिश्ता आठ साल से कोई लोकायुक्त नहीं है। बेईमानी के खिलाफ मुबयना (कथित) जंग छेड़ने वाले अन्ना हजारे ने अपनी एक टीम नरेन्द्र मोदी से मुलाकात करने के लिए गांद्दी नगर भेजी थी। टीम में प्रशांत भूषण और अग्निवेश समेत कई लोग शामिल थे। मोदी से मिलने के बाद इन लोगों ने मोदी की तारीफों के पुल बांद्द दिए थे। खुद अन्ना हजारे ने मोदी की तारीफों के पुल बांद्दते हुए यहां तक कह दिया था कि मुल्क के दीगर चीफ मिनिस्टर्स को मोदी से सबक सीखना चाहिए। प्रशांत भूषण मोदी से मिलकर इतने उतावले हो गए थे कि उन्होंने इसी बात पर खुशी जाहिर की कि मोदी ने लोकायुक्त की तकर्रूरी करने से पहले उनसे और उनकी टीम से मशविरा करने के लिए कहा है। अन्ना की चैकड़ी वापस दिल्ली गई नरेन्द्र मोदी ने लोकायुक्त की तकर्रूरी में तरह-तरह के बहाने बनाकर अडं़गे डालने शुरू कर दिए। चूंकि गुजरात लोकायुक्त कानून के मुताबिक गवर्नर को यह अख्तियार है कि वह वजीर-ए-आला से मशविरा किए बगैर अपनी तरफ से ही लोकायुक्त की तकर्रूरी कर दे इसीलिए गुजिश्ता बरस पच्चीस अगस्त को गवर्नर कमला बेनीवाल ने रिटायर जस्टिस ए.आर.मेहता को गुजरात का नया लोकायुक्त मुकर्रर कर दिया था। नरेन्द्र मोदी ने पहले तो इस पर खूब शोर मचाया फिर हाईकोर्ट में इसके खिलाफ रिट दायर कर दी। अब उस पर फैसला आया तो पूरी तरह से डिक्टेटर बन चुके मोदी अदालत के फैसले को भी मानने के लिए तैयार नहीं है। कांग्रेस ने उनके इस रवैये को मोदी और बीजेपी का ढोंग (पाखण्ड) करार दिया। कांग्रेस तर्जुमान का कहना था कि मोदी और बीजेपी सिर्फ उन्हीं अदालती फैसलों को तस्लीम करते हैं जो उनके हक में हो। जो उनके हक में नहीं होते उसे तस्लीम नहीं करते। यह बात किसी भी जम्हूरी सिस्टम के मुताबिक नहीं है।

 

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