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  Jadeed Markaz
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अम्बेडकर की तौहीन तो अब की गई

पिछले हफ्ते पार्लियामेंट में एक कार्टून के हवाले से खूब हंगामा करते हुए यह जताने की कोशिश की गई कि मुल्क का आईन (संविधान)तैयार करने वाले और दलितों के मसीहा के नाम से मशहूर डाक्टर बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर के कार्टून को एनसीईआरटी की एक निसाबी (कोर्स की)किताब में शामिल करके उनकी और दलित बिरादरी की तौहीन की गई है। इस हंगामें का ऐसा असर हुआ कि एचआरडी वजीर कपिल सिब्बल को माफी मांगनी पड़ी और यह भी एतराफ करना पड़ा कि हां ऐसा किया जाना गलत है। उस कार्टून का ताल्लुक मुल्क की तीन ऐसी अजीम शख्सियतों से है जिनकी खिदमात को फरामोश करना उनके साथ ज्यादती होगी बल्कि यह कहा जाए तो गलत न होगा कि हम ऐसा करके तीनो शख्सियतों की तौहीन करने के कसूरवार हांेगे। यह शख्सियतें हैं- मुल्क के पहले वजीर-ए-आजम पंडित जवाहर लाल नेहरू, बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर और सियासी कार्टूनों के मुल्क में मूजिद केशव शंकर पिल्लै जिन्हें के.शंकर के नाम से पूरी दुनिया जानती है। जिन कार्टून को निसाबी किताब में शामिल करने पर पार्लियामेंट में हंगामा किया गया वह आज से तिरसठ बरस पहले उन्नीस सौ उनचास में उस वक्त का है जब आईन को तैयार करने का काम अम्बेडकर के सुपुर्द था। मुल्क चाहता था कि जल्द से जल्द अपने आईन के तहत निजाम को चलाया जाए। किसी गैर मुल्क के रहनुमा उसूलों पर मुंहसिर न रहा जाए। यह एक ऐसी ख्वाहिश थी जो हर हिन्दुस्तानी के दिल में थी लेकिन आईनसाजी का काम रफ्तार नहीं पा रहा था। वजीर-ए-आजम जवाहर लाल नेहरू अम्बेडकर से बराबर इसरार कर रहे थे कि यह काम जल्द से जल्द पूरा किया जाए ताकि अवाम में आईनसाजी में ताखीर के ताल्लुक से जो नाराजगी पाई जा रही है उसे दूर किया जा सके। कार्टूनिस्ट शंकर को जब इसकी खबर मिली तो उन्होंने एक कार्टून बनाया। जिसमें दिखाया गया कि अम्बेडकर घोंघे पर बैठे हुए हैं और पंडित नेहरू उन्हें चाबुक दिखा रहे हैं। कार्टून में जो कुछ दिखाया गया वह इसी मंशा को जाहिर करने वाला था कि काम को जल्द से जल्द पूरा किया जाए। कहा जाता है कि उस कार्टून से नेहरू और अम्बेडकर दोनों महजूज हुए थे बल्कि इसके लिए श्ंाकर की तारीफ भी की थी। ऐसा न भी हुआ होता तब भी अम्बेडकर नेहरू की वजारती कौंसिल में एक मेम्बर की ही हैसियत रखते थे क्या नेहरू को अपने मातहत किसी शख्स को हिदायत देने का अख्तियार नहीं था? भीम राव अम्बेडकर का कद उस वक्त क्या था यह तो वही लोग जानते होंगे जो उस वक्त होंगे लेकिन आज अम्बेडकर ऐसी शख्सियत बना दिए गए हैं कि उन्हें देवताओं में शुमार किया जाने लगा है कम से कम दलित बिरादरी के लोग तो उनसे ऐसी ही अकीदत रखते है। बात तब अच्छी लगती है जब उसे उसके अस्ल तनाजुर(परिपेक्ष्य) में देखा जाए। निसाबी किताब में कार्टून के हवाले से हंगामा करने वाले यह बावर कराने की कोशिश मे थे कि उन्हांेने जैसे कोई सनसनी खेज इंकशाफ किया है जबकि यह कार्टून पिछले छः साल से निसाबी किताब में शामिल था। हंगामा करने वालों ने दरअस्ल बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर की तौहीन करने का जुर्म अब किया है। वह यह भूल गए कि जिस कार्टून पर खुद उसे कोई एतराज नहीं था जिस पर बनाया गया तो आज इस पर एतराज करने से क्या हासिल है। अगर यह सिलसिला आगे बढ़ा तो इजहारे ख्याल की आजादी का गला घोंटने जैसा होगा। कार्टून किसी मजहबी पेशवा का नहीं है जिससे मजहबी जज्बात को ठेस पहुंचती हो। सभी सियासी लोग है सियासत हमेशा रंग बदलती रहती है। इसी सियासी रंग का ही नतीजा है कि कपिल सिब्बल को माफी मांगनी पड़ती है और एनसीईआरटी के साबिक मुशीर सुहास पल्सीकर के दफ्तर पर शरपसंद अनासिर धावा बोलते हैं। ऐसी अदम रवादारी (असहिष्णुता) से मुल्क के एत्तेहाद के पारा-पारा होेने का अंदेशा पैदा हो गया है। इस पर फौरी तौर पर रोक लगाने की सख्त जरूरत है और इस रवादारी को फरोग देेने की जिसपर नेहरू और अम्बेडकर दोनों सख्ती से कारबंद रहे।

कुलदीप सिंह बावेजा
अमृतसर, पंजाब।

 

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