कुरआन मजीद से
मुसलमानों का ताल्लुक
शहीद हकीम मोहम्मद सईद
कुरआन मजीद से मुसलमान का ताल्लुक बिल्कुल वैसा ही है जैसे जिस्म का
जान से। कुरआन नहीं तो इस्लाम नहीं। अगर कुरआन को मुसलमान ढाल न बनाए
तो वह इस्लाम की तालीमात से बेबहरा उस आदमी की तरह है जो अंद्देरी रात
में इद्दर-उद्दर भटकता फिरे और उसे निशाने राह और मंजिले मकसूद नजर न
आए। कुरआन नहीं तो मुसलमान रूहे इस्लाम से महरूम है। कुरआन नहीं तो रशद
व हिदायत नहीं। कुरआन मजीद दीनी और दुनियावी तालीमात का इलाही मजमूआ
है। यह इंसानों की हिदायत के लिए नाजिल किया गया ताकि वह उसे पढ़े, उस
पर गौर करे और दुनिया को समझे और अल्लाह तआला और उसके रसूल की इस तरह
इताअत करे कि दुनिया में सरबुलंदी हालिस हो और आखिरत में भी निजात व
सवाब के मुस्तहक हो। कुरआन मजीद से मुसलमान का ताल्लुक ऐसा है कि इसके
बगैर गोया वह गुमराही के गढ़े में पड़ा हुआ है। कुरआन मुसलमान की रूह
है, उसकी जान है, उसका ईमान है, उस की फलाह व बहबूद का वसीला है,
सरबुलंदी और खुशहाली का यकीनी जाब्ता है। दुनिया की बड़ी से बड़ी ताकत
उस उम्मत का मुकाबला नहीं कर सकती जो कुरआन को पढ़ती और उस पर अमल करती
है। कुरआन सीद्दी राह दिखाता है, फकीरों को बादशाह बना देता है, जाहिलों
को आलिम व फाजिल बना देता है। इंसानों को उनकी हकीकत से आशना करता है
और कायनात के राज उनपर खोल देता है।
कुरआन मजीद की इब्तिदा ही में अल्लाह तआला फरमाता है- बेशक यह वही
किताब है जिसके मिन जानिबुल्लाह होेने में रत्ती बराबर भी शक नहीं है
और इस कुरआन की खासियत यह है कि वह मुत्तकियों की हिदायत करता है और
फिर यह भी बता दिया कि कुरआन मजीद की निगाह में मुत्तकी कौन लोग हैं।
फरमाया कि जो लोग गैब पर ईमान लाते हैं नमाज कायम करते हैं और जो नेमते
अल्लाह तआला ने उन्हें दी है उनमें दूसरों को भी शरीक करते हैं और
अल्लाह के रसूल पर जो कुछ अल्लाह की तरफ से नाजिल होता है उसे वह
बेचूंचरा तस्लीम करते हैं और साबिका सहीफों के मिनजानिबुल्लाह होने पर
ईमान रखते हैं और इन तमाम अवसाफ के अलावा इस बात पर भी वह पूरा यकीन
रखते हैं कि दुनियावी जिंदगी एक आरजी जिंदगी है। इसके बाद आखिरत का दिन
आएगा और बुरे आमाल के लिए सजा दी जाएगी और अच्छे आमाल के लिए भी जजा
है। इस तफसील के बाद यह बात खुद बखुद वाजेह हो जाती है कि कुरआन मजीद
के मुताले और इसे ढाल बनाए बगैर कोई इंसान हिदायत नहीं पा सकता और जो
मुसलमान है वह तो ऐसी बात सोंच भी नहीं सकता कि अल्लाह तआला के जो
एहकाम अल्लाह के रसूल की वसासत से भेजे गए हैं उनसे गफलत बरते और फिर
इसका मुतवक्के रहे कि उसे हिदायत नसीब हो जाएगी। इस किस्म की तवक्को की
मिसाल ऐसी है कि जैसे कोई शख्स इमली का पेड़ लगाए और उसमें आम के फलों
की तम्मना करे। जो मुसलमान कुरआन मजीद का मुताला नहीं करते वह गफलत का
शिकार हैं और जिस कदर जल्द वह इस हकीकत को समझ लें उसी कदर जल्द उनकी
तंगदस्ती खत्म होगी और फिर वह दुनिया की इमामत के मनसब पर सरफराज हो
सकेंगे। इसलिए कि अल्लाह तआला ने ऐसे लोगों को जमानत दी है और फरमाया
है कि यही लोग हैं कि जो अल्लाह की तरफ से हिदायत याफ्ता हैं और यही
लोग हैं जो फलाह पाने वाले हैं।
नबी करीम (सल0) कुरआन मजीद की तालीम व तर्बियत का बतौर खास एहतमाम
फरमाते थे। इस लिए सदर अव्वल में मुसलमानों की अक्सरियत कुरआन की
हुफ्फाज थी और हर मामले में उससे रहबरी हासिल करती थी। इसलिए यह मशहूर
वाक्या है कि नबी करीम (सल0) की वफात के बाद एक मुसलमान हजरत आयशा
सिद्दीका (रजि0) की खिदमत में हाजिर हुआ और आप (सल0) के अखलाक से
मुताल्लिक दरयाफ्त किया। आप ने फरमाया- कुरआन पढ़ो, अल्लाह के रसूल के
अखलाक मालूम हो जाएंगे।
आखिरी हज के मौके पर नबी करीम (सल0) ने जो खुतबा दिया वह इंसानी तारीख
का सबसे कदीम और जामे चार्टर है। उस खुतबे में आप (सल0) ने बतौर खास
ताकीद फरमाई है कि मैं तुम में दो चीजें छोड़ता हूं अगर तुमने उनको
मजबूती से पकड़ लिया तो गुमराह ने होंगे। वह चीजें क्या है? एक अल्लाह
की किताब दूसरी नबी करीम (सल0) की सुन्नत। इस हिदायत की रौशनी में
कुरआन मजीद से मुसलमान का जो ताल्लुक होना चाहिए वह इस कदर वाजेह है कि
इसके सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता कि मुसलमान और कुरआन लाजिम व मलजूम है।
तारीख गवाह है जब तक मुसलमान कुरआन मजीद का बतौर खास मुताला करते और उस
पर अमल पैरा रहे उस वक्त तक दुनियावी सरबुलंदी हासिल करते रहें। उस
जमाने की दो बड़ी सल्तनतों से इस तरह टकरा गए कि दुश्मन सामाने जंग के
अलावा तादाद की कसरत पर भी नाजां थे और तहजीब व तमद्दुुन के भी मुद्दई
थे लेकिन मुसलमानों के मुकाबले में शिकस्त पर शिकस्त खाते रहे। मुसलमानों
के पास अस्लहे की भी कमी होती और वसायल भी महदूद होते। फौजियों की
तादाद भी कम होती, इसके बावजूद जब वह अपने मुकाबिलतन महदूद वसायल के
साथ दुश्मनों के मुकाबले पर आते तो उनके पास सिर्फ कुरआन की तालीमात
थीं। वह जानते थे कि अल्लाह ने हमें जंग की तैयारियों का हुक्म तो जरूर
दिया है लेकिन इसके बावजूद कामयाबी का राज ईमान और अल्लाह की नुसरत पर
भरोसा है और यह भरोसा कुरआन मजीद के मुताले से पैदा होता है। अल्लाह ने
उनसे वादा किया था कि कितनी ही छोटी छोटी जमाअते हैं जो बड़ी बड़ी
जमाअतों पर अल्लाह के हुक्म से गालिब आ जाती हैं। (अल बकरा-249)
इसीलिए मुसलमानों के लिए अजमत का राज सिर्फ कुरआन मजीद के साथ वाबस्तगी
मे है। इसके अलावा मुसलमानों ने अपने दौरे उरूज में साइंस और माकूलात
में जो कुछ भी तरक्की की वह कुरआन मजीद ही की हिदायत का नतीजा थी।
इसलिए कि कुरआन मजीद में कई मकामात पर अल्लाह तआला बताता है कि कायनात
को इंसानों के लिए बनाया गया है। इसलिए उनका फर्ज है कि इसके तमाम राज
खोले और एक तरफ कायनात के जर्रे-जर्रे को इंसान की फलाह व बहबूद के काम
में लाएं और दूसरी तरफ खालिके कायनात की तस्बीह करें और उसका शुक्र अदा
करें कि उसने किस कदर बेशुमार नेमतें इंसान के लिए पैदा की हैं।
कुरआन मजीद ईमान का सरचश्मा और अमल का मरकज है। यह अपने मानने वालों को
बताता है कि हाथ पर हाथ द्दरे बैठे न रहें और सिर्फ आखिरत का नारा
लगाकर दुनियावी सरबुलंदी के हुसूल में कोताही न करें। यह दुनिया भी उनके
लिए है और आखिरत भी।
कुरआन मजीद की फज़ीलत व अज़मत
मौलाना काजी मतीन उल्लाह कुरैशी रशादी
कुरआन का तआर्रूफ:- जब अल्लाह तआला को यह मकसूद हुआ कि नबियों और रसूलों
का सिलसिला खत्म करने, कायनात की रहनुमाई और फलाह व सआदत के लिए एक ऐसा
सहीफा नाजिल करे जो रहती दुनिया तक रशद व हिदायत का फर्ज अंजाम देता
है, जो हमेशा के लिए रौशनी का मीनार हो, जिसमें आइंदा आने वाली कौमे
रहनुमाई हासिल करती हैं, जिसका पैगाम और जिसकी रहनुमाई कौम, वतन,
जुगराफियाई हुदूद यहां तक कि जमान व मकान की कैद से मावरा हो तो उसने
अपने आखिरी नबी (सल0) पर दीन व दुनिया की फलाह व सआदत और रशद व हिदायत
का एक जामे और मुकम्मल दस्तूर नाजिल किया जो कुरआन मजीद की सूरत में
हमारे पास मौजूद है। जिस तरह अल्लाह तआला ने मोहम्मद (सल0) को तमाम
अम्बिया-ए-कराम के इल्मी व अमली कमालात और फजायल व मुहासिन का मजमूआ
बनाया और कमालाते तबुवत को आप (सल0) की जात पर खत्म करके खात्मुन्नबीन
के मनसब पर फायज किया उसी तरह आप पर नाजिल होने वाले इस दस्तूरे हिदायत
और आईने फलाह व सआदत को तमाम पिछली आसमानी किताबों और इलाही उलूम का
खुलासा, लब लुबाब और गंजगिरा माया बनाया।
इसमें इंफिरादी मुश्किलात का हल भी है और इज्तिमाई मसायल का भी। कोई
पहलू ऐसा नहीं चाहे वह मआश व इक्तेसाद से मुताल्लिक हो या इस्लाहे मआशरा
से या उसका ताल्लुक उमूरे ममलिकत से हो। गरज कि कोई पहलू ऐसा नहीं जिससे
मुताल्लिक इस किताब में मुकम्मल रहनुमाई मौजूद न हो। इमाम फखरूद्दीन
राजी कहते हैं तमाम आसमानी सहीफों का खुलासा और निचोड़ कुरआन मजीद है।
यही वजह है कि कुरआन मजीद पर ईमान लाना तमाम आसमानी सहीफों पर ईमान लाने
के मुतरादिफ है और कुरआन का इंकार तमाम इल्हामी किताबों का इंकार है। (मुकदमा
तफसीरे कबीर इमाम फखरूद्दीन राजी) इस अबदी दस्तूर का कामिल तरीन किताब
के बारे में खुद अल्लाह तआला ने इरशाद फरमाया है- बिला शुब्हा यह कुरआन
सीद्दे रास्ते की निशानदेही करता है।
एक और जगह इरशादे इलाही है- हम ने इस किताब में किसी चीज को अद्दूरा नहीं
छोड़ा। तमाम खूबियां उस परवरदिगार के लिए साबित हैं जिसने अपने बन्दा (हजरत
मोहम्मद) पर किताब नाजिल फरमाई और उसमें जर्रा बराबर कमी नहीं रखी। (सूरा
कहफ) एक और जगह इरशाद है- अगर हम इस कुरआन को किसी पहाड़ पर नाजिल करते
तो ऐ मुखातिब तू देखता कि वह पहाड़ खुदा के खौफ से दब जाता और
टुकड़े-टुकड़े हो जाता। (हश्र)
नबी करीम (सल0) ने भी अपने बेशुमार इरशादात में कुरआन मजीद की फजीलत व
अजमत बयान की है। जैसा कि इरशाद है- मेरी उम्मत की सबसे बेहतरीन इबादत
कुरआन मजीद की तिलावत है। एक और जगह इरशाद है- लोगों में सबसे ज्यादा
इबादत गुजार वह है जो सबसे ज्यादा तिलावत करने वाला हो। (कंजुल आमाल)
‘‘तुम में सबसे बेहतर वह है जिसने कुरआन की तालीम हासिल की और दूसरे को
उसकी तालीम दी। (बुखारी)
‘‘अल्लाह के कलाम की फजीलत दूसरे कलाम पर वही है जो खुद अल्लाह तआला को
अपनी तमाम मखलूकात पर फजीलत व बरतरी है (तिरमिजी)
एक जगह यूं इरशाद होता है- कुरआन शफाअत करने वाला है और उसकी शफाअत
कुबूल की जाएगी और मुखालिफत भी करने वाला है उसकी मुखालिफत भी सुनी
जाएगी। जो इसको अपना पेशवा बना लेगा उसको वह जतन में ले जाएगा और जो इसे
पसेपुश्त में डालेगा उसको वह जहन्नुम में पहुंचाएगा। एक और हदीस में आया
है- कुरआन के हाफिज अल्लाह तआला के दोस्त हैं जो उनसे दुश्मनी करेगा
गोया अल्लाह से दुश्मनी करेगा जो उनसे दोस्ती करेगा गोया अल्लाह से
दोस्ती करेगा।
कुरआन की खुसूूसियात:- कुरआन मजीद की बेशुमार खुसूसियात है। यहां चंद
खुसूसियात एहतियातन तहरीर में लाई जाती है-
हिफाजत:- चूंकि कुरआन मजीद कयामत तक हर दौर और कौम के लिए हिदायत व
रहनुमाई का सरचश्मा है इसलिए इसकी हिफाजत का खास वादा अल्लाह तआला ने
फरमाया है। फरमाने इलाही है- हम ही ने यह कुरआन नाजिल किया और हम ही
इसकी हिफाजत करने वाले हैं।
जिंदा जबान:- कुरआन मजीद जिस जबान मे नाजिल हुआ वह एक जिंदा जबान है।
आज भी दुनिया के बीस से ज्यादा मुल्कों में यह जाबन बोली जाती है और
उनकी कौमी जबान है। यह जबान दुनिया की चंद बड़ी जबानों में से एक है।
जबकि पहले जितनी आसमानी किताबें जिन जबानों में नाजिल हुईं वह मुर्दा
हो चुकी हैं।
आलमगीर किताब:- कुरआन मजीद के अलावा बाकी सारी आसमानी किताबें सिर्फ
किसी खास मुल्क या खास कौम के लिए थी मगर कुरआन मजीद सारी दुनिया की
इंसानियत के लिए पैगामे हिदायत है। यह एक आलमगीर किताब है जिसकी
तालीमात हर दौर हर मुल्क में काबिले अमल और वाजिबुल अमल है।
जामे किताब:- पहले की किताबों में से कुछ किताबें सिर्फ अखलाकी तालीमात
पर मुश्तमिल थीं कुछ सिर्फ मनाजात और दुआओं का मजमूआ थी। कुछ फकही
मसायल का मजमूआ थी किसी में अकायद का बयान था मगर कुरआन मजीद ऐसी किताब
है जिसमें हर पहलू पर रौशनी डाली गई है। इसमें अकायद व आमाल, अखलाक व
रूहानियत, तारीखी वाक्यात मनाजात, फकही मसायल, तिजारत, सियासत, मआशरती
आदाब, तहजीब व सकाफत के उसूल गरज यह कि यह ऐसी जामे किताब है जो जिंदगी
के हर शोबे में रहनुमाई करती है।
मुहज्जब किताब:- कुरआन मजीद मे कोई बात ऐसी नहीं जो अक्ल के खिलाफ हो
और जिसे तजुर्बा और दलील से गलत साबित किया जा सके (नऊजुबिल्लाह )
इसमें कोई गैर अखलाकी बात नहीं। उसने तमाम अम्बिया का अदब व एहतराम
सिखाया उनके बारे में बताया कि वह नेक और परहेजगार लोग थे।
कुरआन मजीद का एजाज:- कुरआन मजीद फसाहत व बलागत का वह शाहकार है जिसका
मुकाबला करने से अरब व अजम के तमाम फसीह व बलीग लोग आजिज रहे। कुरआन
मजीद में सब मुखालिफों को दावत दी गई कि वह एक छोटी सी कुरआनी सूरत के
मुकाबले में कोई सूरत बना लाएं मगर कोई भी मुकाबले की जुर्रत न कर सका।
क्योंकि यह तो खुदा का कलाम है किसी बंदे का बनाया हुआ कलाम नहीं फिर
कोई बंदा इसका मुकाबला किस तरह कर सकता है।
कुरआन मजीद एक सच्ची किताब है:- इसकी दावत और पैगाम भी सच्चाई से भरपूर
है। इसके दलायल निहायत मजबूत और मुस्तहकम है। अल्लाह तआला का इरशाद है-
‘‘ कुरआन एक ऐसी किताब है कि इसकी आयतें मुहकम की गई हैं फिर साफ-साफ
बयान की गई एक हकीम बाखबर की तरफ से।’’
कुरआन मजीद की तासीर:- कुरआन मजीद कलामे इलाही है। इसलिए उसको पढ़ने और
उस पर अमल करने वाले के लिए बला की तासीर रखी गई है। इस तासीर का
अंदाजा इस आयत से होता है अगर हम इस कुरआन को पहाड़ पर नाजिल करते तो
आप देखते कि पहाड़ भी अल्लाह के खौफ से कांप उठते और टुकड़े-टुकड़े हो
जाते। कुरआन मजीद वह बाबरकत और रशद व हिदायत की वह किताब है जो जिंदगी
के हर शोबे में रहनुमाई व हिदायत का सरचश्मा और बाइसे फलाह है।
ग़ीबत-एक बदतरीन गुनाह
मुफ्ती मोहम्मद शोएब
जब कोई मआशरा गुनाह को गुनाह समझना ही छोड़ दे और लोगों के दिलों से
इसका एहसास भी खत्म हो जाए खासकर जबकि वह गुनाह गुनाहे कबीरा भी हो तो
समझ लीजिए कि यह समाज अपने ईमानी कत्ल का सामान तैयार कर रहा है। आज
हमारे समाज में जो गुनाह बहुत ज्यादा आम हो गया है कुरआन मजीद ने उस
गुनाह को जितनी सख्त वईद के साथ जिस अंदाज से जिक्र किया वह शायद ही
किसी और गुनाह को जिक्र किया हो। अल्लाह तआला सूरा हिजरात में फरमाता
है-‘‘ एक दूसरे की गीबत न करो क्या तुम में से कोई यह पसंद करेगा कि वह
अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाए? उससे तो तुम खुद नफरत करते हो और
अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह बड़ा तौबा कुबूल करने वाला बहुत मेहरबान
है।
गौर कीजिए क्या सिर्फ इतना हुक्म काफी नहीं था कि गीबत न करो। मोमिनीन
के लिए तो सिर्फ इस हुक्म के बाद ही गीबत हराम हो चुकी थी लेकिन अल्लाह
तआला इस गुनाह की मजीद मजम्मत बताकर तरतीब के अंदाज में मोमिनीन को
ताकीद फरमा रहा है कि किसी की गीबत करना दरहकीकत अपने मरे हुए भाई का
गोश्त खाने के मुतरादिफ है। नबी करीम (सल0) की वह हदीस तो मशहूर है कि
गीबत जिना से बदतर है। गीबत को जिना से बदतर करार दिया गया हालंाकि
जिना जिसमें किसी की इज्जत से खेला जा रहा होता है और इंतिहा दर्जे की
बेशर्मी और बेहयाई वाला गुनाह है लेकिन इसके बावजूद गीबत को जिना से
बदतर करार दिया जा रहा है। मुहद्दिसीन हजरात इसकी दो वजहें बताते हैं।
एक यह कि जिना करने वाले को बहरहाल नदामत व शर्मिंदगी हो जाती है तो
उसे तौबा की तौफीक भी हो जाती है लेकिन गीबत करने वाले को आम तौर पर उस
गुनाह का एहसास नहीं होता जिसकी वजह से उसे तौबा की तौफीक नहीं होती।
दूसरी वजह यह है कि जिना के गुनाह का ताल्लुक अल्लाह तआला से है यानी
जिना करने वाला अगर तौबा कर ले तो अल्लाह तआला की रहमत से इंशाअल्लाह
माफी हो जाएगी लेकिन गीबत के गुनाह का ताल्लुक बंदो से है। गीबत करने
वाला अगर माफी मांग भी ले तब भी माफी न होगी जब तक कि वह शख्स माफ न
करे जिस की गीबत की थी। एक हदीस में हजरत अनस (रजि0) की रिवायत है कि
नबी करीम (सल0) ने फरमाया- जब मुझे मेराज के सफर पर ले जाया गया तो
वहंा मेरा गुजर कुछ ऐसे लोगों पर भी हुआ जो अपने चेहरे को नोच रहे थे
अैर अपने सीनों को पीट रहे थे। मैंने हजरत जिब्रईल (अलै0) से पूछा- यह
कौन लोग हैं? तो जवाब दिया कि वह लोग हैं जो दुनिया में लोगों की
गीबतें किया करते थे। तबरानी में हजरत अबू बक्र (रजि0) से रिवायत मंकूल
है कि नबी करीम (सल0) दो कब्रों के पास से गुजरे तो खड़े रहे और
फरमाया- इन दोनों कब्र वालों पर अजाब हो रहा है जाओ कहीं से टहनी ले
आओ। इसलिए मैं सब्ज टहनी का टुकड़ा ले आया तो आप (सल0) ने उसके दो
हिस्से किए दोनों कब्रों पर एक एक टुकड़ा गाड़ दिया और फिर फरमाया
तुम्हें मालूम है इन्हें अजाब क्यों दिया जा रहा है? यह अजाब किसी बड़ी
वजह से नहीं दिया जा रहा है। यह अजाब दो वजहों से दिया जा रहा है। अगर
यह चाहते तो दुनिया में इन गुनाहों से बचना उनके लिए कोई मुश्किल न था
और वह दो गुनाह गीबत और पेशाब है। उनमें से एक दुनिया में गीबत किया
करते थे और दूसरे पेशाब की छींटों से अपने आप को बचाते नहीं थे।
एक बार हजरत उमर (रजि0) के साहबजादे अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि0) की
मजलिस में एक श्ख्स ने हुजाज बिन यूसुफ की बुराइयां बयान की और उन्हें
इंतिहाई ज्यादा बुरा-भला कहा तो हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रजि0) ने उसे
रोका और कहा कि यह जो तुम हुजाज की बुराइयां कर रहे तो यह गीबत ही है
और यह ख्याल जेहन से निकाल दो कि अगर हुजाज जालिम है तो उसके खिलाफ
गीबत भी जायज है बल्कि याद रखो कल कयामत वाले दिन जहां हुजाज से उन
सैकड़ो लोगों के कत्ल का हिसाब लिया जा रहा होगा वहीं तुम से भी उस
गीबत का हिसाब लिया जाएगा जो तुम उसके पीछे कर रहे हो।
मुफ्ती मोहम्मत तकी उस्मानी फरमाते हैं इस वाक्ये से पता चलता है कि
अगर कोई शख्स फासिक व फाजिर है जालिम है गुनाहे कबीरा मंे मुब्तला है
तब भी उसके खिलाफ गीबत जायज नहीं । हां जो शख्स एलानिया फसक व फजूर में
मुब्तला है या खुल्लम खुल्ला किसी गुनाह कबीरा का कसूरवार है या सरेआम
शराब पीता है तो उसके पीठ पीछे कोई शख्स उसकी यह हालत बयान करता है तेा
शरअन वह गीबत में शुमार नहीं होगा क्योंकि वह तो खुद एलानिया यह गुनाह
करके अपनी हालत लोगों के सामने पेश करता है लिहाजा यह गीबत में शुमार
नहीं होगा और यही मतलब है इस हदीस का जिसमें आप (सल0) ने फरमाया था कि
यानी फासिक की गीबत गीबत नहीं। इन आयतों और हदीस के जिक्र करने का मकसद
यही है कि अपने आप को और अपने दायरे अख्तियार में रहने वालों को इस
बदतरीन गुनाह से बचाइए। याद रखे जिस तरह गीबत करना हराम है उसी तरह
गीबत सुनना भी हराम है। अल्लाह तआला मुझे और आप सब कारईन को इस गुनाह
से बचने की हिम्मत और तौफीक अता फरमाएं।