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बीमारियों से दूर
रखती है साफ़-सफ़ाई
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि साफ-सफाई से
बीमारियों के फैलने का इमकान कम हो जाता है खासकर गर्मी के मौसम में,
क्योंकि इस मौसम में उमस भरी गर्मी की वजह से बीमारियों को फैलने का
पूरा मौका मिलता है। इसलिए अगर घर से लेकर इस्तेमाल में आने वाली तमाम
चीजों की साफ-सफाई पर पूरा ध्यान दिया जाए तो काफी हद तक इस मौसम में
होने वाली बीमारियों से बचा जा सकता है। वैसे भी जब हाइजीन और जरासीम
की बात होती है तो अक्सर हमारा ध्यान टायलेट, क्लीनर डस्टबीन और बाथरूम
तक ही जाता है लेकिन घर के कुछ अहम हिस्सों को हम भूल जाते हैं। जहां
से नुक्सान पहुंचाने वाले जरासीम अनजाने मे हम पर हमला करते हैं।
रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होेने वाली कई ऐसी चीजें हैं जहां
ज्यादा जरासीम होते हैं जो हमें बीमार बनाते हैं। गर्मी के मौसम में
पांच साल से कम उम्र के बच्चे डायरिया और न्यूमोनिया से दोचार होते हैं
क्योंकि वह रोजमर्रा की जिंदगी में जाती तौर पर साफ-सफाई का ध्यान नहीं
रख पाते। रोजाना दोस्तों से हाथ मिलाने, किताबे उठाने या टायलेट जाने
वगैरह पर बच्चों के हाथों में एक किस्म के जरासीम माईक्रोब्स पहुंचते
हैं। लंच करते वक्त यही जरासीम उनके जिस्म के अन्दर दाखिल हो जाते हैं
जो एलर्जी का सबब बनते हैं। इसलिए बच्चों में यकसूई और इम्यूनिटी को
बढ़ाने के लिए आयरन विटामिन और मिनरस्ल के साथ-साथ वाल्दैन की
जिम्मेदारी है कि वह बच्चों को साफ-सफाई के बारे में बताएं साथ ही घर
की साफ-सफाई का भी ख्याल रखें ताकि बैक्टीरिया को फैलने का मौका ही न
मिले। बिस्तर, तकिया और गद्दोें में भी गर्द-गुबार रहते हैं जो जिल्द
को नुक्सान पहुंचाते हैं और इनसे एलर्जी होती है। अगर आप अपने बेडरूम
को आरामदेह बनाना चाहती हैं तो बेडरूम की साफ-सफाई को भी अपने मामूलात
में शामिल करना होगा जैसे कि बेडशीट साफ-सुथरा रखें, हफ्ते में दो बार
बेडशीट जरूर बदलें। गद्दे का कवर महीने में एक बार बदल दें। चादर और
तकिए के कवर को हमेशा ठंडे पानी में कम डिटर्जेंट में द्दोंए। मैट्रेस
एक महीने के वक्फे पर पलट-पलट कर इस्तेमाल में लाएं। इनकी भी सफाई
बराबर करती रहें। अगर सजावटी सामान यहां रखें हो तो उनकी भी सफाई जरूर
करें। किचन की स्लैब पोछने के लिए इस्तेमाल होने वाले कपड़ो में ऐसे
बैक्टीरिया हो सकते हैं जिनसे निमोनिया पेचिश और फूड पाइजनिंग जैसी
बीमारियां होेने का खतरा होता है। दरअस्ल यह पेचिश, हैजा, पेट से
मुताल्लिक बीमारियों का सबब बनते हैं। ऐेसे ही बैक्टीरिया और जरासीम
टायलेट के नलों, उसके दरवाजों के हैंडलों पर भी होते हैं। अगर ठीक तरह
से हाथ न द्दोए जाएं तो यह जिस्म में आसानी से पहुंच जाते हैं। इसलिए
सिंक व नलों को सिर्फ पानी से साफ करने के बजाए क्लोरीन मिले पानी से
साफ करें। बर्तन साफ करने वाले स्पंज या स्क्रबर को साफ और ज्यादा दिनों
तक सूखा रखने की कोशिश करें। स्पंज जितनी ज्यादा देर तक गीला रहेगा उतना
ही ज्यादा जरासीम पनपेंगे। किचन में काम करने वाली औरतें एक ही तौलिए
का इस्तेमाल कई कामों में करती है और रोजाना उस कपड़े की सफाई भी नहीं
होती जिसकी वजह से यहां भी वायरस अपना अड्डा बना लेते हैं। इसलिए किचन
में इस्तेमाल होने वाले कपड़े को तीस सेकण्ड के लिए माइक्रोवेव में या
गर्म पानी में उबालें ताकि बैक्टीरिया पूरी तरह से खत्म हो जाएं। सिंक
की पाइप को साफ करने के लिए आद्दा कप बेकिंग सोडा और आद्दा कप सफेद
सिरका को मिलाकर पाइप में डालें और दस मिनट के लिए छोड़ दें। रात में
सोने से पहले इस घोल को पाइप में डालकर भी रात भर के लिए छोड़ सकती
हैं। किचन के डस्टबिन की साफ-सफाई का खास ख्याल रखें साथ ही अगर आप
किचन में सब्जी वगैरह काटने के लिए कटिंग बोर्ड का इस्तेमाल करती हैं
तो उसे भी बराबर गर्म पानी से साफ करती रहें क्योंकि कटिंग बोर्ड मे भी
जरासीम होते हैं। किचन में एग्जास्ट फैन लगवाए ताकि वहां की हवा में
ताजगी रहे और जरासीम को वहां पनपने का मौका न मिले।
जराससीम और बैक्टीरिया को फैलने का पूरा-पूरा मौका बाथरूम में मिलता
है। इसलिए यहां इस्तेमाल होेने वाली तमाम चीजों को बराबर साफ करती रहे।
इसके लिए एंटी बैक्टीरियल क्लीनर का इस्तेमाल कर सकती है। हफ्ते में एक
या दो बार बाथरूम की नाली में एक या दो कप सिरका जरूर डाल दें। हाथों
में जमें बैक्टीरिया छः से अड़तालीस घ्ंाटे तक जिंदा रहते हैं इसलिए सही
तरीके से हैंडवाश जरूरी है। एक घंटे में जिल्द के तकरीबन दस लाख सेल्स
बेजान होते हैं और जब तौलिए से जिस्म को पोंछा जाता है तो यह बेजान
सेल्स तौलिए से चिपक जाते हैं। ऐसे में जब तौलिए को गीला ही बाथरूम में
छोड़ दिया जाए तो इसमें बैक्टीरिया पनपते रहते हैं। इसलिए इस्तेमाल के
बाद तौलिए को द्दूप में जरूर सुखा लें।
बच्चे ज्यादा होते हैं फूड एलर्जी का
शिकार
एलर्जी का मतलब जिस्म में कुछ खास ऐसी चीजें पाई
जाती है जिन्हें एलर्जन कहते हैं, के तयीं शदीद तौर पर रद्देअमल। खाने
पीने की हर चीज सभी को सूट नहीं करती। इसका मतलब यही है कि जो चीज हम
खाते हैं उसके तयीं हमारे जिस्म में पाए जाने वाले एलर्जन बहुत हस्सास
होते हैं और बहुत जल्द सरगर्म हो जाते हैं। उस चीज को वह कुबूल नहीं
करते। किसी को किसी भी चीज से एलर्जी हो सकती है। फूड एलर्जी का शिकार
बच्चे ज्यादा होते हैं। कुछ चीजें ऐसी है जिनमें ग्लयुटिन होता है। ऐसी
चीजों में गेहूं, राई, बाजरा, मछली, अंडे, मूंगफली, सोयाबीन, दूध और
डेयरी प्रोडक्ट्स और खुश्क मेवे अहम है। इनसे बच्चों में एलर्जी हो सकती
है। कुछ लोगों को बैगन, खीरा, भिंडी और पपीता से भी एलर्जी होती है।
बच्चों में एलर्जी का मसला पुश्तैनी भी होता है। अगर वाल्दैन को किसी
चीज से एलर्जी है तो उस चीज से एलर्जी उनके बच्चे को भी हो सकती है।
फूड एलर्जी जिस्म की किसी खास चीज के तयीं हिस पर मुंहसिर होती है। फूड
एलर्जी की अलामतें खाने के दो-तीन घंटे के बाद महसूस होने लगती हैं।
बहुत कम मामलों में यह देखा जाता है कि यह अलामतें कई घंटों के बाद नजर
आती है। इसकी अलामतें हैं- सूजन आ जाना, उल्टी होना, भूक लगना, दस्त आना,
मुंह गले, आंखों जिल्द और जिस्म के दूसरे हिस्सों में खुजली होना, पेट
दर्द और पेट में मरोड़ होना, नाक बहना और दिल की धड़कने तेज होना भी
अहम अलामतों में शामिल है।
फूूड एलर्जी का मसला अक्सर बचपन में ही शुरू होता है। लेकिन यह किसी भी
उम्र में भी हो सकती है। ज्यादातर बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ
धीरे-धीरे यह समला खत्म हो जाता है। जिन बच्चों को दूध, अंडा गेंहू और
सोयाबीन से एलर्जी है और अगर वह पांच साल तक की उम्र तक इन चीजों का
इस्तेमाल न करे तो बाद में यह मसला खत्म हो जाता है। लेकिन मूंगफली,
मेवे और शेलफिश की एलर्जी पूरी उम्र रहती है। जब घर से बाहर खाना खाएं
तो इसका पता लगा लेना जरूरी होता है कि खाने में ऐसी कोई चीज तो शामिल
नहीं जिससे आप को एलर्जी है।
हड्डियों की मज़बूती के लिए चाहिए
कैल्शियम
जिस्मानी ढांचे को खड़ा करने के लिए हड्डियों का
मजबूत होना जरूरी है और हड्डियों कीमजबूती के लिए कैल्शियम। इसलिए
हड्डियों और दांतों की मजबूती के लिए खाने में काफी मिकदार में
कैल्शियम होना चाहिए। एक गिलास दूद्द से तकरीबन चालीस फीसद कैल्शियम ही
बच्चों को मिल पाता है जबकि एक नानवेज बच्चे की डाइट में कैल्शियम की
मिकदार की जरूरत चार सौ से आठ सो मिलीग्राम तक होती है। लेकिन इसमें से
सिर्फ तीस फीसद कैल्शियम ही बच्चे के जिस्म में जज्ब हो पाता है। ऐसे
में सिर्फ दूद्द से बच्चे की कैल्शियम की जरूरतें पूरी नहीं हो पाती।
खासकर उन बच्चों की जो सिर्फ दूद्द पर ही मुंहसिर होते हैं। ऊपरी चीजों
को डाइट में शामिल करने पर भी कैल्शियम मिल जाता है लेकिन सिर्फ दूद्द
पीने वाले बच्चों में कैल्शियम की जरूरत को पूरा करने के लिए सिरप
वगैरह दिए जाते हैं।
बच्चों के जिस्मानी और जेहनी फरोग के लिए कैल्शियम बहुत जरूरी है।
हड्डियों में कैल्शियम निनान्वे फीसद होता है जबकि एक फीसद कैल्शियम ही
खून में होता है। कैल्शियम की कमी से बच्चों की हड्डियों में लचीलापन आ
जाता है जिससे रिकेट्स नाम की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। बच्चों के
लिए इसलिए कैल्शियम जरूरी होता है क्योंकि यह हड्डियों और दांतों को
मजबूती देता है। मसल्स में खून का दौरान मामूल पर रखता है, हड्डियों,
दांतो वगैरह का ढांचा बनाता है। जिस्म में कैल्शियम का एक फीसद
आयोडाइज्ड कैल्शियम की शक्ल में सैयाल में घूमता है जो जिंदगी के लिए
जरूरी है। ब्लड प्रेशर को मामूल पर रखने में मदद करता है कैल्शियम और
खून का थक्का बनाने में अहम रोल अदा करता है। एक से तीन साल के बच्चे
के लिए आमतौर पर माना जाता है कि पांच सौ मिलीग्राम कैल्शियम की जरूरत
होती है और चार से आठ साल के लिए आठ सौ मिलीग्राम जबकि नौ से अट्ठारह
साल की उम्र के बच्चे के लिए तेरह सौ मिलीग्राम कैल्शियम की दरकार होती
है। जब बच्चे के जिस्मानी व जेहनी फरोग के लिए कैल्शियम इतना जरूरी है
तो यह जानना भी जरूरी हो जाता है कि कैल्शियम कहां से और किन-किन चीजों
से मिल सकता है। एक गिलास दूद्द से तीन सौ मिलीग्राम मिलता है। एक कप
दही खाने से तीन सौ मिलीग्राम कैल्शियम हासिल होता है। एक गिलास संतरे
के रस से तीन सौ मिलीग्राम कैल्शियम मिलता है जबकि एक सौ बीस मिलीग्राम
कैल्शियम हासिल करने के लिए आद्दा कप पालक काफी है। आद्दा कप बीन्स में
एक सौ दस मिलीग्राम कैल्शियम होता है। इनके अलावा हरी सब्जियों, मसूर,
बादाम, मटर, ब्रोकली वगैरह में भी काफी मिकदार में कैल्शियम होता है।
दूद्द से बने प्रोडक्ट्स जैसे चीज, मिल्क शेक, पनीर वगैरह में कैल्शियम
भरपूर मिकदर में होता है, बच्चों को सिर्फ दूद्द देेने के बजाए उन्हें
मिल्क शेक की शक्ल में दूद्द दे। दूद्द को और ज्यादा तवानाईबख्श बनाने
के लिए उसमें से मलाई न निकालें। दूद्द में मिल्क पाउडर, ड्राई फ्रूट्स
वगैरह डालकर बच्चों को दें।
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