सीरिया के बोहरान के
गुनाहगार
सीरिया में इन दिनों जो कुछ हो रहा है उसको जिस तरह से पेश
किया जा रहा है उससे एक ही तास्सुर जाता है कि ट्यूनेशिया
से शुरू हुई अवाम की बगावत मिस्र और लीबिया होते सीरिया तक
पहुंच गई है। मगर यह सच्चाई नहीं है। सीरिया के मौजूदा
बोहरान का मकसद अमरीकी मफादात का हुसूल है। इसी साजिश से
पर्दा उठा रहे हैं भीम सिंह जिनका मजमून पिछले दिनों हिन्दी
रोजनामा जन सत्ता में शाया हुआ था। अखबार के शुक्रिए के
साथ यह मजमून हम जदीद मरकज के पढ़ने वालों के लिए पेश कर
रहे हैं - इदारा
इराक, मिस्र, ट्यूनेशिया और इसके बाद लीबिया, सूडान में
सियासी उथल-पुथल के बाद ऐसा लग रहा है जैसे इस्लामी दुनिया
का खास मुल्क सीरिया भी अमरीका और नाटो के घेरे में आ चुका
है। उन्नीस सौ अरसठ में मैं मोटर साइकिल पर सीरिया में
दाखिल हुआ था जब मैं दुनिया के सफर पर था। फिर उन्नीस सौ
पचहत्तर में वहां गया था। उस वक्त फिलिस्तीनी लीडर यासर
अराफात सीरिया में रह रहे थे। फिर अरब मुल्कों में
उथल-पुथल और इराक जंग के दौरान लेबनान की खानाजंगी (गृहयुद्ध)
के सिलसिले में दूरदर्शन के लिए मुझे दस्तावेजी फिल्म बनाने
का भी मौका मिला। मेरे कितने ही मजामीन हिन्दुस्तान-अरब
रिश्तों पर शाया हुए हैं। मगर अभी आजाद मुशाहिद के तौर पर
जाने का तजुर्बा कुछ और ही था।
सीरिया की राजद्दानी दमिश्क पहुंचते ही तमाम राज से पर्दा
उठ गया, जब वह निजी और सरकारी दफ्तरों में काम-काज और
कारोबार यानी हर काम मामूल के मुताबिक चल रहा था। लेकिन
गैर मुल्की एजेंसियों की नश्रियात (प्रसारण) सुन कर ऐसा
महसूस होता था जैसे कि पूरा सीरिया आग के दहाने पर खड़ा
है। सीरिया में सात दिनों के दौरान मैं दर्जन भर वजीरों,
कई आला अफसरों, मीडिया से जुड़े लोगों और गैर मुल्की
नामानिगारों से भी मिला। भोलेप्पू जो दमिश्क से तीन सौ
किलोमीटर के फासले पर है, हूमेज भी इसी कड़ी में आता है,
जो तुर्की की सरहद से चालीस किलोमीटर के फासले पर है।
भोलेप्पू के गवर्नर की सरकारी रिहाइश पर पहुंचा ही था कि
थोड़ी दूर पर एक द्दमाका हो गया। फौजियो से भरी एक बस को
शिद्दतपसंदों ने उड़ा दिया था। हम लोेग अस्पताल में जख्मियों
की मिजाजपुर्सी के लिए गए। हमलावरों की कोई पहचान नहीं हो
सकी। यूएन के मुशाहिद उस वक्त एक पांच सितारा होटल में
आराम फरमा रहे थे। जब उनसे पूछा गया कि सीरिया की यह
जंगबंदी किस के साथ है या किसके खिलाफ है तो वह यह भी नहीं
बता सके कि मुखालिफ फरीक कौन है? और यह कहानी है उन ठिकानों
की जहां पर ‘‘भूत’’ रातो रात गोलाबारी करके गायब हो जाते
हैं।
जिस दिन यानी छब्बीस अप्रैल को हम लोग सीरिया से लौट रहे
थे लंदन की आजाद नश्रियाती टीम दमिश्क पहुंची। उन्हें
सीरिया की पुलिस ने पूरा तहफ्फुज फराहम किया और सहूलतें भी
दीं कि जहां चाहे जा सकते हैं। जब यह टीम दमिश्क के एक
मोहल्ले बेगम जेनवा पहुंची, जो शिद्दतपसंदी के लिए निहायत
बदनाम है, मोहल्ले के अन्दर इतना जबरदस्त द्दमाका दिन दहाड़े
हुआ कि दूर-दूर खड़े लोगो को फिजा में लाशो के टुकड़े टुकड़े
दिखाई दिए।
यहां पर यूएन के मुशाहिदीन का क्या रोल हो सकता है, इसका
जवाब तो वही मुल्क दे सकते हैं जिन्होंने करारदाद नम्बर -
20042 मंजूर करके सीरिया में मुशाहिदीन भेजने का फैसला किया
था। सीरिया के लोगों को तशद्दुदपसंदी के इन द्दमाकों से
उतनी हैरत नहीं है जितनी कि सीरिया के खिलाफ करारदाद को
हिन्दुस्तान के हिमायत देेने पर है। यह सवाल मुझ से
बार-बार पूछा गया चाहे मैं सीरिया के सरकारी टेलीविजन के
सामने खड़ा था या किसी निजी चैनल से मुखातिब था। वहां के
दानिश्वरों ने बार-बार याद दिलाया कि क्या हिन्दुस्तान
सीरिया की दोस्ती भूल गया है?
सीरिया के साबिक सदर हाफिज अलअसद पहले अरब लीडर थे
जिन्होंने अपने मुल्क के अल तहरीर मैदान पर एक नेशनल हाइवे
का नाम जवाहर लाल नेहरू के नाम पर रखा था। जिस मुल्क में
महात्मा गांद्दी को स्कूलों में पढ़ाया जाता हो और जिस
मुल्क ने हर हाल में हिन्दुस्तान से दोस्ती निभाई हो उस
मुल्क के खिलाफ हिन्दुस्तान ने वोट क्यों दिया?
दमिश्क यूनिवर्सिटी के बाहर उम्र दराज बुजुर्ग शख्स ने मुझे
अरबी में बताया कि ‘‘ मैं हिन्दुस्तान में चक्राता में,
फौजी तर्बियत लेने गया था और हमें हिन्दुस्तान से बेहद
प्यार है। इंदिरा गांद्दी ने हमारा बहुत साथ दिया था। क्या
आप इंदिरा गांद्दी से सीरिया को बचाने की गुजारिश कर सकते
हैं?’’ उस शख्स ने इतनी संजीदगी से यह बात कही थी कि मैं
उसे यह बताने की हिम्मत नहीं कर पाया कि इंदिरा गांद्दी अब
इस दुनिया में नहीं है।
ऐसा लगता है कि ब्रिटिश- अमरीकी खेमा सीरिया की कयादत और
तहजीब को मिटाने पर आमादा हैं, जैसा कि उन्होंने इराक,
लीबिया और दीगर अरब मुल्कों में किया। सीरिया के
नुक्ता-ए-नजर से इसकी अहम वजह यही है कि यहूदी लाबी ओबामा
इंतजामिया पर हावी है और उसके जरिए ‘भेडिए और मेमने’ की
कहानी दोहरा रही है।
सीरिया के लोगों में यह आम ख्याल है कि जम्हूरियत के नाम
पर मुल्क में मौजूदा बोहरान इसलिए खड़ा किया गया है ताकि
यूएन की करारदाद नम्बर 242ए 328ए 425 और दर्जन भर दीगर
करारदादों की नाकामी से दुनिया का ध्यान हटाया जा सके,
क्योंकि इस्राईल ने अमरीका की शह पर इन करारदाद को अमली
जामा पहनाने से इंकार कर दिया। इन करारदाद में इस्राईल के
जरिए कब्जा किए गए तमाम अरब इलाकों, सीरिया की गोलान
पहाडि़यों, यरूशलम वगैरह केा खाली करने की हिदायत दी गई
थी। यूएन मुशाहिदीन को गाजा भेज कर यरूशलम में बसाई जा रही
यहूदी बस्तियों को रोका जा सकता था। बोहरान जम्हूरियत या
शहरी हुकूक का नहीं बल्कि अरब तेल, पानी, और स्ट्रैटेजिक
इलाकों पर एंग्लो, अमरीकी मफादात की तकमील के लिए पैदा किया
गया है।
यूएन सलामती कौंसिल में सीरिया के खिलाफ हिन्दुस्तान के
वोट देेने पर अरब दुनिया में गहरा गम व गुस्सा है। सीरिया
ने यूएन करारदाद के मुताबिक वहां कोई तीन सौ मुशाहिदीन के
आने पर रजामंदी जाहिर की है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है
कि यह नाम निहाद जंगबंदी किन फरीक में या किन फरीक के
खिलाफ की गई है, बेकसूर लोगों का मारा जाना, आद्दी रात को
भोलेप्पू और होम्ज में इमारतों को उड़ा देना और ऐसे ही
आलूदाजदा किया जा रहा है। महात्मा गांद्दी से लेकर अटल
बिहारी वाजपेयी तक अरब दुनिया के बारे में हिन्दुस्तान का
इंतिहाई कारगर रोल रहा है। चाहे वह फिलिस्तीन के लोगों की
खुद मुख्तार रियासत की तामीर का सवाल हो या इराक के
एत्तेहाद का मैने यासर अराफात या सद्दाम हुसैन के लफ्जों
में हिन्दुस्तान की तारीफ सुनी है जो इंदिरा गांद्दी को
‘‘बहन इंदिरा गांद्दी’’ पुकारने में बड़ा फख्र समझते थे।
हिन्दुस्तान ने अरब मुल्कों को कभी मायूस नहीं किया।
हिन्दुस्तान उन मुल्कों में था जिसने उन्नीस सौ सैतालीस
में फिलिस्तीन की तकसीम की मुखालिफत की थी और फिलिस्तीन की
हिमायत में यूएन के अन्दर और बाहर हर इंटरनेशनल फोरम पर
फिलिस्तीनियों की रियासत की तामीर के मसले पर हिमायत की
थी। ऐसा लगता है कि अमरीका के सदर बराक ओबामा यहूदी लाबी
के असर में उसी तरह आ चुके हैं जिस तरह बुश सीनियर और बुश
जूनियर आ गए थे। मिडिल ईस्ट के तयीं यूएन की दोहरी पालीसी
पूरी दुनिया के सामने खुलकर आ गई है। इस्राईल के खिलाफ
करारदादों को चालीस बरसों में भी लागू कराने की कोशिश नहीं
की गई, मगर इराक, लीबिया और अब सीरिया के खिलाफ यूएन की
करारदादों को फौरन अमली जामा पहनाने में यूरोपी मुल्कों
यानी नाटो को इस्तेमाल किया गया। सूडान के दो टुकड़े कर
दिए गए और इस्राईल के खिलाफ एक छोटी सी करारदाद भी लागू
नहीं की जा सकी।
सीरिया की गोलान पहाडि़यां, दुनिया भर में मशहूर यरूशलम
आद्दी गाजापट्टी और दीगर कई अरब इलाके उन्नीस सौ सरसठ से
इस्राईल के गैर कानूनी कब्जे में चले आ रहे हैं। फिलिस्तीन
के अन्दर यहूदी नई बस्तियों की तामीर कर रहे हैं। यूएन
करारदादों की खुल्लम खुल्ला खिलाफवर्जी हो रही है।
फिलिस्तीन की गाजा पट्टी को तो इस्राईल ने कई साल से चारो
तरफ से घेर रखा है। स्कूल बंद तमाम निजी और सरकर इदारे
बंद, यानी दस साल से फिलिस्तीनी शहरी भूकों मरने पर मजबूर
कर दिए गए हैं। यूएन के आब्जर्वर कोफी अन्नान को गाजा और
येरूशलम जाना चाहिए था न कि सीरिया में, ताकि वह पता लगाए
कि यूएन की करारदादों की खिलाफवर्जी इस्राईल ने किस ढिढाई
से की है।
लंगड़ाती सरमायादारी, लड़खड़ाती दुनिया
तकरीबन चार साल कब्ल दुनिया में मंदी का जो दौर शुरू हुआ था
उसने द्दरती की जन्नत कहे जाने वाले अमरीका की हालत तबाह
कर दी। नतीजा यह कि वहां आक्यूपाई वाल स्ट्रीट की जो तहरीक
शुरू हुई वह अभी तक ठंडी नहीं पड़ी है। ऐसा महज इसलिए हुआ
कि मुल्क की सारी दौलत एक फीसद लोगों के आस-पास सिमट गई
थी। खुद को सुपर पावर कहने वाले मुल्क की हालत आज यह है कि
वहां की आबादी का सातवां हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी
बसर कर रहा है अमरीका का यह हाल इस वजह से हुआ कि वहां
कारपोरेट सेक्टर को बढ़ावा दिया गया और सरमायादारों को सर
पर बिठाया गया। तकरीबन ऐसी ही पालीसियो की वजह से योरप
खुसूसन फ्रांस की हालत बहुत तबाह है। सरमायादारों ने अपनी
निगाहें चीन पर गड़ा दी तो वहां भी हालात बिगड़ने लगे।
भारत में भी ऐसी ही पालीसियां अपनाई जा रही है जिसमें
सरमायादारों और कारपोरेट सेक्टर को फायदा हो मगर यह नहीं
सोंचा जा रहा है कि तरक्की के गुब्बारे में हवा भरने वाले
सरमायादार जब मुल्क से अपना पैसा निकालकर दूसरे मुल्कों
में लगा देंगे तो भारत का हाल भी अमरीका जैसा हो सकता है।
रोजनामा हिन्दुस्तान में अपने मजमून में शशि शेखर ने बताया
है कि जब सरमायादारी लंगड़ाती है तो पूरी दुनिया की चाल
में लड़खड़ाहट पैदा हो जाती है। इस सूरतेहाल से बचने की
जरूरत है। हम रोजनामा हिन्दुस्तान के शुक्रिए के साथ यह
मजमून अपने पढ़ने वालों के लिए पेश कर रहे हैं - इदारा
मेरे एक दोस्त टेलीविजन की दुनिया में रूतबे वाले ओहदे पर
फायज है। पिछले दिनों वह लास बेगास गए थे। बड़े खुश लौटे।
बोले-पहली बार बेगास में एक गोरे को हिन्दुस्तानी
भिकारियों की तर्ज पर भींक मांगते देखा। और तो और इस बार
कैसीनो सिटी के कमरांे के किराए में बेहद कमी देखने को
मिली। उनका मानना है कि अमरीकी अब उन्हीं हालात के शिकार
हो रहे हैं,जिसके पैदा करने वाले वह खुद हैं। वह सौ फीसद
सही है।
जमीन पर जन्नत कहा जाने वाला अमरीका खुद जहन्नुम की लपटों
से घिरता जा रहा है। सरकर की पूरी कोशिशों के बाद
‘आक्यूपाई वाल स्ट्रीट’ तहरीक ठंडी नहीं पड़ रही है। हर
तरफ मौजूदा सिस्टम के खिलाफ आवाजें बुलंद हो रही हैं। इन
तहरीक चलाने वालों को हिमायत देने वाले वह लोग हैं जो खुद
को दुनिया के सबसे अमीर मुल्क में निनान्वे फीसद मानते
हैं। उनका कहना हे कि सिर्फ एक फीसद लोगों ने पूरी सत्ता,
असासा और शान व शौकत पर कब्जा कर रखा है। आंकड़े इस इल्जाम
को सच साबित करते हैं। यूनाइटेड स्टेट आफ अमरीका में 14ण्5
फीसद लोग गिजाइ अदम तहफ्फुज (खाद्य सुरक्षा) के शिकार हैं।
गिजाई अदम तहफ्फुज का मतलब है कि इन लोगों को भरपेट खाने
पीने की चीजें खरीदने मे ंहर रोज हाथ की तंगी का सामना
करना पड़ता है। तकरीबन पांच करोड़ लोगों के पास हेल्थ
इंश्यूरेंस नहीं है। अमरीका का कोई भी शहरी बगैर
इंश्यूरेंस के ऐसी जिंदगी का तसव्वुर तक नहीं कर सकता।
जिसमें वह बीमार न हो। इन लोगों को जरा सी बीमारी भी
कंपकंपा जाती है। यही नहीं, कम से कम चार करोड़ बीस लाख
लोग गरीबी की रेखा के नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं। यह
तादाद यूनाइटेड स्टेट की कुल आबादी का सांतवां हिस्सा है।
जो लोग सिटी बैंक के सीईओ विक्रम पंडित के तकरीबन सवा दो
करोड़ डालर के पैकेज से रश्क महसूस करते हैं उन्हें जानकर
हैरानी होगी हकि विक्रम जैसे लोग अमरीका में बहुत कम है।
इसीलिए जब सिटी बैंक के सरमायाकार मंडल ने उनके वेतन भत्तो
में हैरतअंगेज इजाफे पर उंगली उठाई तो उस एतराज को खास व
आम की खुली हिमायत हासिल हुई। आपको ताज्जुब होगा कि उन्नीस
सौ सत्तर के बाद आला कारपोरेट अफसरान की तंख्वाह में कई
गुना इजाफा हुआ है लेकिन वह नौकरी पेशा लोग जो निचली जमात
मे आते हैं, उनके वेतन-भत्ते दस फीसद कम हो गए हैं। क्या
कमाल है। इन चार दहाइयों में महंगाई कहां से कहां पहुंच गई
और पगार का औसत कम हो गया। और तो और ऊपरी जमात में बैठे
बीस फीसद लोगों का अमरीकी जायदाद के पचासी फीसद हिस्से पर
कब्जा है। यही वजह है कि सरमायादारी के पांव लड़खड़ाने लगे
हैं और समाजी तवाजुन की नई मांग जोर पकड़ रही है। वहां के
दौलतमंद भी जानते है कि यह हाल हमेशा नहीं रह सकता। आज
नहीं तो कल ‘आक्यूपाई वाल स्ट्रीट’ जैसी तहरीक और असरदार
साबित होगी। यह हालत उन्हें मुसीबत में डाल देगी और अनारकी
(अराजकता) के हवाले हो जाने से अच्छा है कि वसायल के बेहतर
इस्तेमाल पर जोर दिया जाए। लेकिन यह हो कैसे?
अमरीका की बदहाली की पूरी दुनिया हिस्सेदार है। फ्रांस में
निकोलस सरकोजी देा साल पहले तक कितने मकबूल हुआ करते थे?
आज वह सत्ता से बाहर हो चुके हैं। सोशलिस्ट पार्टी के
फ्रांस्वा ओलांद के पास अब सत्ता के मुकम्मल अख्तियार है।
लेकिन जीत के साथ ही बदहाल होते मुल्क के लोगों ने उनकी
कुव्वत को चैलेंज देते हुए सवाल खड़े करना शुरू कर दिए
हैं। समाजी और मआशी तौर पर लड़खड़ाते फ्रांस का वह क्या
भला कर पाएंगे?
याद करें। ग्रीस की लड़खड़ाहट के साथ ही यूरोप के
मुस्तकबिल पर सवालिया निशान लग गया था। इस तारीखी मुल्क के
लोग जिस अजीयत को बरदाश्त कर रहे हैं वह डराती है। अगर
यूरो का जवाल हुआ तो इससे फर्क नहीं पड़ता कि डालर मजबूत
होगा या येन लेकिन यह सच है समाज और सकाफती तश्कील नव की
एक नेक कोशिश बेवक्त मौत का शिकार हो जाएगी। यूरोप तारीखी
तौर पर अंदरूनी इख्तिलाफात का शिकार रहा है। बर्लिन की
दीवार के गिरने के साथ उन्नीस सौ नवासी में इस बर्रे आजम
के तखलीकी लोगों ने एक ख्वाब देखा था कि वह मुंकसिम
(विभाजित) कल्चर और ख्यालात के तारीखी कलंक से आजादी पा
लेंगे। अगर यूरो दफन होता है तो उनका यह नेक नीयत ख्वाब भी
टूट जाएगा। ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरमायादार मुल्कों मे ऐसा
हो रहा है। हम चीन की बात कर सकते हैं। सब जानते हैं कि दो
हजार दस मेें पूरी दुनिया की एक्तेसादी तरक्की में इस बड़े
मुल्क ने उन्नीस फीसद का तआवुन अकेले दिया था। इसमें इस
साल सिर्फ छः फीसद के इजाफे की उम्मीद है। उन्नीस सौ
छिहत्तर में सकाफती इंकलाब के बाद ड्रैगन ने जो हुंकार भरी
उसके पीछे वहंा की ताकतवर मेहनतकश आबादी है। चीन से सस्ता
और माहिर मेहनतकश पूरी दुनिया में नहीं है। इसीलिए वहंा
पच्छिम के मल्टीनेशनल दानवों ने फैक्ट्रियों की शक्ल मेें
अपने पंख फैलाने में देर नहीं लगाई। जिस लेबर पावर के बूते
चीन दुनिया पर राज करने के ख्वाब देख रहा है खुद उसकी हालत
भी बेहद खस्ता है। उन्नीस सौ उनचास में जब चीन में
कम्युनिस्ट राज शुरू हुआ था तो वहंा औसत उम्र पैतीस साल
थी। उन्नीस सौ सत्तर में यह अरसठ साल तक पहुंच गई थी।
लेकिन गफलत में न रहें कि सकाफती इंकलाब के बाद आई तरक्की
ने चीन के आम आदमी की जिंदगी में इजाफा कर दिया है। उन्नीस
सौ अस्सी से उन्नीस सौ अट्ठानवे के बीच में यह सिर्फ दो
साल बढ़ सकी है जो दुनिया भर के औसत से कम है। कम्युनिस्ट
मुल्कों की लड़खड़ाहट तभी नजर आती है जब वह गिरने को होते
हैं। पिछली सदी की आखिरी दहाई की शुरूआत तक किसी को अंदाजा
नहीं था कि सोवियत यूनियन की ताकत को दीमक चाट गया है। चीन
की बदहाली कहीं फिर से उस भूली हुई कहानी को तो नहीं
दोहराने जा रही?
खुद अपने मुल्क का हाल बदहाल है। विदेशी सरमायाकारी
लड़खड़ा रही है। सनअती तरक्की कम हो गई है। शरह नमू (विकास
दर) निशाने से पीछे चल रही है। घरेलू मांग में कमी जारी
है। इंटरनेशनल रेटिंग इदारा स्टैंडर्ड एंड पुअर्स को लगता
है कि सरकार में इससे निपटने की मुनासिब सलाहियत नहीं है।
यह वहीं स्टैडर्ड एंड पुअर्स है जिसने पिछले साल अमरीका की
रेटिंग कमकर दी थी और पूरी दुनिया कांप उठी थी। भारत के
कारपोरेट दिग्गज अभ्ीा तक दो हजार आठ की मंदी से हकबकाए
हुए थे अब उन्हें अगली आफत हर रोज करीब आती महसूस हो रही
है। नई दिल्ली से वाशिंगटन डीसी बरास्ता बीजिंग हर तरफ हाल
बेहाल नजर आ रहा है।
दूसरी आलमी जंग के बाद तेजी से पनपी सर्द जंग का खात्मा
उन्नीस सौ इक्यान्वे में सोवियत यूनियन के बिखराव से हुआ
था। तब माना गया था कि माक्र्सवद में दूर तक दौड़ने की
सलाहियत नहीं है। सोवियत यूनियन के मेम्बर मुल्कों में
फैली बदहाली को लोगों ने एक्तेसादी बराबरी के उसूल का
रिवायती और आखिरी हिस्सा मान लिया था। हर जगह अमरीका और
उसके दोस्त मुल्कों की तारीफ जोरों पर थी। भारत जैसे मुल्क
जो तीसरी दुनिया के नाम पर तवाजुन बनाकर चल रहे थे उन्हें
बैक गियर में दौड़ने पर मजबूर होना पड़ा था। लेकिन दो हजार
आठ की मंदी ने सरमायादारी के नकाब को नोचकर फेंक दिया है।
तब से अब तक कुछ लोगों की करतूतों की सजा पूरी दुनिया भुगत
रही है। सर्द जंग तो दहाइयों चली लेकिन अकेली सरमायादारी
दो दहाई में ही लंगड़ाने लगी। इसीलिए सवाल उठ रहे हैं। अब
अगर फिर से मंदी आती है तो सरमायादारी के पैरोकार का जवाब
देंगे? क्या इस दुनिया को एक नए निजाम का जरूरत है?
यूपी में समाजवादी
सरकार-निशाने और चैलेंजेज
कुरबान अली
उत्तर प्रदेश में पिछली छः मार्च को आए असम्बली एलक्शन
नतीजों और समाजवादी पार्टी को मुकम्मल अक्सरियत मिल जाने
और सूबे के अब तक के सबसे नौजवान वजीर-ए-आला अखिलेश यादव
के सत्ता संभालने के बाद सवाल यह उठता है कि इस सरकार के
सामने निशाने (लक्ष्य) क्या है और चैलेंजेज क्या हैं? और
नई सरकार उत्तर प्रदेश को ‘‘उत्तम प्रदेश’’ बनाने के दावे
के साथ कैसे निपटेगी?
उत्तर प्रदेश आबादी के एतबार से मुल्क का सबसे बड़ा सूबा
है और अगर इसे हिन्दुस्तान से अलग कर एक मुल्क के तौर पर
देखा जाए तो यह दुनिया का छठा बड़ा मुल्क होगा। साथ ही इस
सूबे के मसायल भी मुल्क के दीगर सूबों से सबसे ज्यादा और
अलग किस्म के हैं और इंतजामी नुक्ता-ए-नजर से भी उत्तर
प्रदेश को चला पाना एक टेढ़ी खीर है। समाजवादी पार्टी अपने
आप को डाक्टर राम मनोहर लोहिया की विरासत, नजरियात और
सियासी औजार मानती है लेकिन यह जगजाहिर है कि वह समाजवादी
नजरियात के तयीं कितना पुरअज्म (दृढ संकल्प) है। मुलायम
सिंह यादव की कयादत में पिछली बार जब सूबे में समाजवादी
पार्टी की सरकार बनी थी तो उसके ‘‘सूत्रद्दार’’ अमर सिंह
थे जिनका समाजवाद से कभी कोई लेना देना नहीं रहा और
जिन्होने मुंबई और दिल्ली के सनअतकारों (उद्योगपतियों) को
लेकर और अमिताभ बच्चन जया बच्चन और संजय दत्त जैसे फिल्मी
कलाकारों को लेकर समाजवाद का जो चेहरा बनाया उसे देखकर तो
खुद डाक्टर लोहिया की रूह भी कांप गई होगी और वह कह उठे
होंगे कि अगर उत्तर प्रदेश में अमर सिंह के जरिए स्पांसर्ड
यह ‘समाजवाद’ है तो फिर हम समाजवादी नहीं है। संजय
डालमिया, जयंत मल्होत्रा, अमर सिंह, जया बच्चन और अनिल
अंबानी को राज्य सभा में भेजने वाली पिछली समाजवादी सरकार
की सिर्फ यही इमेज नहीं थी कि वह बड़े सरमायाकारों की
हिमायती और गरीब मुखालिफ सरकार थी बल्कि समाज के मुजरिमाना
अनासिर को बढ़ावा देने की इमेज भी समाजवादी पार्टी और उसकी
सरकार ने बना ली थी, इसलिए दो हजार सात में जब बहुजन समाज
पार्टी ने नारा दिया कि वह ‘गुण्डा राज’ खत्म करेगी तो उसे
एलक्शन में बड़ी कामयाबी मिली और बीएसपी ने पहली बार
रियासत में अपने बलबूते पर सरकार बनाई। इस बार समाजवादी
पार्टी ने अपना चेहरा और दामन साफ करते हुए काफी हद तक
साफ-सुथरी इमेज वालों को टिकट दिए और अपने वालिद मुलायम
सिंह यादव और चचा शिवपाल यादव और आजम खां की सिफारिश की
परवा न करते हुए अखिलेश ने डीपी यादव जैसों को पार्टी मे
शामिल नहीं किया और न ही फिरकापरस्त किरदार वाले कल्याण
सिंह और साक्षी महाराज जैसो को कोई तवज्जो दी। नतीजे में
अखिलेश को आम लोगों में वाहवाही मिली और एलक्शन में बड़ी
अक्सरियत भी। लेकिन जिस दिन वजीर-ए-आला अखिलेश यादव ने
मुजरिमाना इमेज वाले आजाद मेम्बर असम्बली रघुराज प्रताप
सिंह उर्फ राजा भैया को अपनी काबीना में कैबिनेट वजीर के
ओहदे का हलफ दिलाया उस दिन अखिलेश यादव की यह इमेज खत्म हो
गई कि वह मुजरिमाना इमेज के लीडरो को पसंद नहीं करते। राजा
भैया को वजीर बनाने की कोई मजबूरी भी उनके सामने नहीं थी
लेकिन किन वजहों से उन्हें ऐसा करने पर मजबूर होना पड़ा
वही बेहतर जानते होंगे।
समाजवादी लीडर डाक्टर राम मनोहर लोहिया ने समाजवाद की जो
इजमाली (संक्षिप्त) तारीफ बताई थी वह थी ‘‘ बराबरी और
खुशहाली’’ यानी बराबरी पर मबनी एक ऐसा समाज जहां कोई
नाबराबरी न हो। जहां जात, मजहब, नस्ल और रंग की बुनियाद पर
कोई इस्तेहसाल न हो और समाज का हर शख्स बराबर मौके पाते
हुए अपने आपको तरक्कियाफ्ता और खुशहाल बनाए। अपने इसी उसूल
और नजरियात के बलबूते डाक्टर लोहिया ने समाजवादी सरकार
बनाने का ख्वाब देखा था। मुल्क आजाद हो जाने के बाद
दहाइयों तक लोहिया ने मुल्क में सोशलिस्ट पार्टी बनाकर
तामीरी अपोजीशन का रोल निभाया और वोट फावड़ा और जेल का
नारा दिया। उनका कहना था कि वोट के जरिए सरकार बनाने और
बदलने का काम होना चाहिए, फावडे के जरिए तामीरी काम जैसे
नदियां खोदने, सड़क बनाने और एक घंटा रोजाना मुल्क के लिए
खिदमत करना और सिविल नाफरमानी के जरिए सरकार को उसकी गलत
पालीसियों को बदलने के लिए मजबूर करना और ऐसा न हो पाने पर
जेल जाना। लोहिया दूरअंदेश थे। उन्नीस सौ सरसठ के आम
इंतखाबात से पहले उन्हांेने पेशीनगोई की थी कि इस बार के
एलक्शन में कांग्रेस पार्टी हारेगी। लेकिन किसी ने उनके इस
दावे पर यकीन नहीं किया। यहां तक कि कांग्रेस मुखालिफीन
पार्टियों ने भी। लेकिन जब उन एलक्शन के बाद नौ रियासतों
में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी तो लोगों ने डाक्टर लोहिया
की पेशीनगोई का लोहा माना।
उन्नीस सौ सरसठ के आम इंतखाबात से पहले अपनी पार्टी
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का मंशूर (चुनाव घोषण पत्र) लिखते
हुए डाक्टर लोहिया ने कहा था कि उन्नीस सौ सरसठ के एलक्शन
में कांगे्रस पार्टी हारेगी और कई सूबों में गैर कांगे्रसी
सरकारें बनेगी। मेरी उन गैर कांग्रेसी सरकारों को सलाह
होगी कि वह हुकूमत साजी के पहले दिन ही कुछ ऐसे एलानात करे
कि जिससे बिजली सी कौंद्द जाए और चैराहे पर खड़ा आम आदमी
कांग्रेस राज और गैर कांगे्रसी राज का फर्क महसूस करे, साथ
ही हलफ लेने के छः महीने के अन्दर सरकार को कोई ऐसा कानून
बनाना चाहिए जिससे कांग्रेस राज और अवामी राज का फर्क साफ
तौर पर सामने आ जाए। अपने इसी मंशूर में डाक्टर लोहिया ने
यह भी लिखा कि संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी यह जानती है कि ऐसे
इंतिहा पसंद कागजी प्रोग्रामों से कोई फायदा नहीं होगा जो
रियासत का खर्च बढ़ाते हों और आमदनी घटाते हों। सरकार ने
अभी तक बड़े लोगो केा शान व शौकत और अय्याशी बढ़ाते रहना
सिखाया है। नतीजा यह हुआ कि मुल्क का प्रोडक्शन बढ़ने में
बड़ी रूकावट आई है। सब लोगो के सामने ऐसी मिसाल है ऐसे
लोगो की जो जिंदगी की दौड़ में कामयाब हुए लेकिन झूट,
चापलूसी, चुगलखोरी, बेईमानी और कम काम करने के सहारे हर
आदमी अपने कुन्बे, जात, बिरादरी या गु्रप की फलाह तलाशने
लगा। पिछले बीस बरस में मुल्क लोगों की आंखो के सामने से
हटता रहा। सामने आयी खुदगर्जी, आराम, छीना झपटी, आपसी
रंजिश और कम होते मुल्की जखीरे से खुद के बढ़ते हुए हिस्से
के लिए झगड़े। चुनावी मंशूर मे ही डाक्टर लोहिया ने सुझाया
था कि समाजवादी गैर कांग्रेसी सरकारों को मालगुजारी या
लैण्ड रेवेन्यू का पूरी तरह खात्मा करना होगा।
खर्च की हद तय करना होगी, खेतिहर और सनअती दामों में
तवाजुन कायम करना होगा और रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों के
बिक्री दाम, लागत और ढुलाई खर्च के डेढ गुना से ज्यादा
नहीं होंगे, अंगे्रजी का खात्मा हेगा और तालीम का मीडियम
मादरी जबान (मातृभाषा) होगी और गरीब के बच्चे से लेकर
सदर-ए-जम्हूरिया के बच्चों को एक ही स्कूल में पढ़ाया
जाएगा। कुछ लाख सरमायादार लोगों की जगह करोड़ो जिंदादिल
लोगों को ऊपर उठाना होगा। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने उन
लोगों के लिए खास मौके के उसूल को अपनाया है जो सदियों से
दबे कुचले और पिछड़े हैं और जिन्हें समाज की बरबरियत ने
दिमागी तौर पर मफलूज और अपाहिज बना दिया है जैसे औरत,
शूद्र, हरिजन, आदिवासी और मजहबी अकलियत। यह लोग खास मौके
के हकदार और इन नव्वे फीसद लोगो के लिए साठ फीसद सीट
रिजर्व रखी जानी चाहिए। (सोशलिस्टों ने बांद्दी गांठ
पिछड़े पावें सौ में साठ)
मार्च-अप्रैल उन्नीस सौ सरसठ में नौ रियासतों में गैर
कांग्रेसी सरकारों की तश्कील के बाद जिनमें से कई रियासतों
में सोशलिस्ट भी सरकारों में शामिल थे, यह सरकारें डाक्टर
लोहिया की उम्मीद के मुताबिक कुछ ज्यादा नहीं कर पाईं और
तकरीबन छः महीने बाद ही डाक्टर लोहिया की बेवक्त मौत हो
गई। अपने इंतकाल से कुछ ही दिन पहले लोहिया ने अपनी माहाना
मैगजीन ‘जन’ के लिए एक मजमून लिखा जिसमें गैर कांग्रेसी
सरकारों का तजजिया करते हुए लिखा कि गैर कांग्रेसवाद कुछ
अपने में ही उलझ गया है और उतना नहीं कर पा रहा है जितना
उससे तवक्को थी। गैर कांग्रेसी सरकारें कई मायनों में बांझ
और बेसूद साबित हुईं हैं जो लोग सरकार में वजीर बन जाते
हैं उनको आप लोगो की भूक की फिक्र नहीं रह जाती। उनकी
फिक्र तो सिर्फ इस बात की रहती है कि किसी तरह अपने ओहदे
पर बने रहें।
सियासत का मामूली कारकुन महज तमाशाई या चिपकू होकर रह गया
है। वह किसी बड़े लीडर या वजीर के साथ चिपके रहने में ही
अपनी आफियत समझता है। वह अपने आपको किसी लायक नहीं बनाता
जबकि देश विदेश की जानकारी और छोटी बड़ी इत्तेलाआत और उनके
तजजिया और उसूूल के बारे में उसे जानकारी होनी चाहिए। साथ
ही अपने इलाके में भी उसे कुछ करके दिखाना चाहिए।
दरबारगीरी, चापलूसी, चुगलखोरी आम कारकुन के दुश्मन हैं।
इसी के सहारे वह ऊपर उठना चाहता है। दूसरे उसकी नकल करते
हैं, सब लोग कुछ होना चाहते हैं। कुछ करने की ख्वाहिश
अक्सर सबकी मर चुकी है और जिनसे है भी वह भी बहुत कमजोर हो
चुकी है। जैसा है वैसे ही रहने दो का कफन भारत की सियासत
पर चढ़ गया है।
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की कयादत वाली समाजवादी
पार्टी की सरकार को अब यह साबित करना है कि वह अपने लीडर
डाक्टर लोहिया के नजरियात उसूल और बातों पर कितना अमल करती
है और किस तरह रियासत में समाजवाद को कायम करती है। चूंकि
समाजवादी पार्टी को इस बार मुकम्मल अक्सरियत मिली है इसलिए
अब उसके पास यह बहाना भी नहीं होगा कि हम दूसरी पार्टियों
की हिमायत से सरकार चला रहे थे इसलिए अपनी पालीसियां लागू
नही कर सके। जिस चुनावी मंशूर की बुनियाद पर समाजवादी
पार्टी ने उत्तर प्रदेश के वोटरों से वोट मांगे हैं उसे
मरहलावार तरीके से लागू करना चाहिए। सिर्फ नारो की हद तक
नहीं बल्कि हकीकी मायनों में उसे लागू करना चाहिए।
पिछली बीएसपी सरकार ने दलित अजीम हस्तियों (महापुरूषों) के
नाम पर बड़े-बड़े पार्क बनाकर अपनी पार्टी के चुनाव निशान
हाथी और पार्टी सुप्रीमों मायावती की मूर्तियां लगवा दी
थी। तरक्की के नाम पर आम लोगों को फायदा कम और बीएसपी
लीडरों को फायदा ज्यादा हुआ। लोग बदनज्मी से तंग आ गए थे
और किसी भी तरह से इस सरकार से पीछा छुड़ाना चाहते थे और
चुनावी नतीजों ने इस बात को साबित भी कर दिया। दो हजार सात
में जिस बहुजन समाज पार्टी को लोगों ने दो सौ छः सीटें
देकर मुकम्मल अक्सरियत से एक्तेदार पर बिठाया था वह इस बार
महज अस्सी सीटों पर सिमट गई और जिस समाजवादी पार्टी को दो
सौ सीटें जीतने की उम्मीद नहीं थी उसे दो सौ चैबीस सीटें
देकर अवाम ने सत्ता में बिठा दिया। समाजवादी पार्टी ने
अपने चुनावी मंशूर में निशाना (लक्ष्य) रखा है उत्तर
प्रदेश में मुकम्मल तौर पर तालीम, सिंचाई और रोजगार,
रोजगार न मिलने तक बेरोजगारी भत्ता पार्टी के मंशूर में
कहा गया है कि समाज का बड़ा तबका भुकमरी का शिकार है, इसे
दूर करना और रोटी कपड़ा और मकान का बंदोबस्त करना हमारा
वादा है कोई आदमी भूका नहीं रहेगा और अगर कहीं भूक से मौत
होती है तो ग्राम प्रद्दान, बीडीओ, एसीडीएम और डीएम के
खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। सूबे की सत्रह पिछड़ी जातों को
शिडूल्ड कास्ट में शामिल किया जाएगा। फिरकावारियत को खत्म
किया जाएगा, अकलियतों को तरक्की दी जाएगी और सच्चर कमेटी
और रंगनाथ मिश्र कमीशन की सिफारिशात को लागू किया जाएगा।
बेहतर मेडिकल सहूलतें फराहम कराई जाएंगी। आराजी तहवील को
रोका जाएगा और उसका सर्किल रेट से छः गुना मुआवजा दिया
जाएगा। देही इलाकों में बीस घंटे और शहरी इलाकों के लिए
बाइस घंटे बिजली की सप्लाई को यकीनी बनाया जाएगा। किसानों
को उनकी पैदावार की लागत कीमत तय करने के लिए एक कमीशन
कायम किया जाएगा। प्राइमरी सतह पर सभी बच्चों के लिए तालीम
को लाजिमी बनाया जाएगा। दो हजार चार से दो हजार सात के बीच
समाजवादी पार्टी की सरकार ने जो पालीसियां लागू की थी और
जिन्हें पिछली सरकार ने खत्म कर दिया था उन्हें दोबारा
शुरू किया जाएगा। नौजवानों का मुस्तकबिल संवारा जाएगा।
उन्हें रोजगार फराहम कराया जाएगा और जब तक रोजगार नहीं
मिलता उन्हें एक हजार रूपए माहाना बेरोजगारी भत्ता दिया
जाएगा। तिजारत और सनअत (उद्योग) की हालत भी बेहतर की जाएगी
और करप्शन खत्म किया जाएगा। समाजवादी पार्टी ने अपने इस
चुनावी मंशूर में आखिरी पैराग्राफ में लोगो से अपील की थी
कि वह पार्टी को अकेले यानी अपने बलबूते पर सरकार बनाने का
मौका दें। उत्तर प्रदेश के अवाम ने उसे कुबूल करते हुए
अपना फैसला सुना दिया और समाजवादी पार्टी को मुकम्मल
अक्सरियत दिला दी। अब यह समाजवादी पार्टी और उसके
वजीर-ए-आला अखिलेश यादव की जिम्मेदारी है कि वह चुनावी
मंशूर मंे किएगए वादे को पूरा करें। मुकम्मल तौर पर ना सही
लेकिन जुजवी (आंशिक) तौर पर इस चुनावी मंशूर पर अमल होना
चाहिए। अगर ऐसा न हुआ तो उत्तर प्रदेश के अवाम डाक्टर
लोहिया के उस कौल पर अमल करने से नहीं चूकेंगे जब लोहिया
ने कहा था कि जिंदा कौमे पांच बरस तक एलक्शन का इंतजार
नहीं करती, अपना मुस्तकबिल हर रोज तय करती हैंै।
दो हजार चैदह में लोकसभा एलक्शन होेने हैं यानी अब से ठीक
दो साल बाद उत्तर प्रदेश में लोकसभा एलक्शन के साथ-साथ
समाजवादी पार्टी की सरकार का मिडटर्म भी हो जाएगा। यहंा यह
भी काबिले जिक्र है कि हालिया असम्बली एलक्शन में समाजवादी
पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को मिले वोटो में सिर्फ 3ण्27
फीसद का ही फर्क है। यानी समाजवादी पार्टी को 29ण्15 फीसद
और बहुजन समाज पार्टी को 25ण्91 फीसद वोट हासिल हुए हैं।
इसलिए समाजवादी पार्टी को यह नहीं समझना चाहिए कि बहुजन
समाज पार्टी की अवामी हिमायत कोई बड़े पैमाने पर खिसकी है
और समाजवादी पार्टी का अवामी हिमायत में कोई बड़ा इजाफा हो
गया है। दूसरे समाजवादी पार्टी की सरकार को यह गुमान भी
नहीं होना चाहिए कि उसे पांच साल तक सरकार चलाने या कहंे
तो हुक्मरानी करने का लाइसेंस मिल गया है। जिस तरह उसने
पिछले बार अपनी मनमानी करके सरकार चलाई थी अगर वैसा ही इस
बार हुआ तो अवाम फिर माफ करने वाले नहीं है। बिहार में हम
लालू प्रसाद का हश्र देख चुके हैं जिन्होंने पन्द्रह बरसों
तक बेरोकटोक राज किया था लेकिन जिन्हें अब दोबारा सत्ता
हासिल होने के लाले पड़े हुए हैं।
कुछ सियासी तजजिया निगारों का मानना है कि दो हजार चैदह के
लोकसभा एलक्शन में शायद फिर वही हालात पैदा हो जो उम्मीद
सौ छियान्नवे के लोकसभा एलक्शन में बने थे। यानी तीसरे
मोर्चे की सरकार बनने के इमकानात जो कम्युनिस्ट पार्टियों
और कांग्रेस पार्टी के गठजोड़ से बनेगा। ऐसे में जिस
पार्टी या लीडर के साथ अपने पचास मेम्बरान पार्लियामेट
होंगे वह वजीर-ए-आजम होगा। वह मुलायम सिंह यादव भी हो सकते
हैं और मायावती भी।
पिछली बार यानी दो हजार नौ में उत्तर प्रदेश में समाजवादी
पार्टी को लोकसभा में तेइस सीटें, बहुजन समाज पार्टी को
इक्कीस और कांगे्रस को भी इक्कीस सीटें हासिल हुईं। मौजूदा
असम्बली के ढांचे के हिसाब से और अहम पार्टियों को मिले
वोटो के तनासुब से आज की तारीख में समाजवादी पार्टी
पैतालीस लोकसभा सीटें जीतने की पोजीशन में है, जबकि बहुजन
समाज पार्टी सोलह, बीजेपी नौ, कांग्रेस पार्टी पांच
राष्ट्रीय लोकदल दो और दीगर व आजाद तीन सीटें जीत सकते
हैं।
मगर यह भी काबिले जिक्र है कि लोकसभा एलक्शन और असम्बली
एलक्शन में इश्यूज अलग-अलग होते हैं और लोकसभा एलक्शन में
कौमी पार्टियों को ज्यादा फायदा मिलता है। यही वजह है कि
दो हजार नौ के लोकसभा एलक्शन में उत्तर प्रदेश में
कांग्रेस पार्टी को इक्कीस सीटें हासिल हुई थी। इस बुनियाद
पर माना जा रहा था कि कांग्रेस पार्टी असम्बली एलक्शन में
इस बार कम से कम सौ सीटें तो जरूर जीतेगी मगर वह अट्ठाइस
पर सिमट कर रह गई। वैसे पैतालीस पचास सीटें उत्तर प्रदेश
में जीतना समाजवादी पार्टी के लिए नामुमकिन भी नहीं है।
अगर वजीर-ए-आला अखिलेश यादव ने लोगों का ध्यान रखकर सरकार
चलाई किसानों के पचास हजार रूपए तक का कर्ज माफ किया देही
और शहरी इलाकों में बीस बाइस घंटे बिजली सप्लाई की, सड़को
की तामीर का काम तेजी से कराया और बच्चों की तालीम खासकर
लड़कियों को मुफ्त साइकिल देकर अगर उन्होंने बेहतर तालीम
का बंदोबस्त कराया तो वह उत्तर प्रदेश में वही काम करने
में कामयाब होंगे जो दो हजार नौ में लोकसभा एलक्शन में
नितीश कुमार ने बिहार में किया था। नितीश कुमार के जेडीयू
बीजेपी गठजोड़ ने इस एलक्शन में चालीस में से बत्तीस सीटे
जीती थी।