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गुरबत की भट्टी में तप कर कुंदन बने
होनहार
नुमाइंदा खुसूसी
लखनऊ! पिछले दिनों आए आईआईटी-जेईई के नतीजों में दो दर्जन से ज्यादा
ऐसे लड़कों ने कामयाबी हासिल की जिन्होंने मुफलिसी की गोद में आंखे खोली।
ऐसे स्टूडेंट्स के लिए बारहवीं तक तालीम हासिल करना ही बहुत दुश्वार
मरहला होता है और इंजीनियरिंग का इम्तेहान पास करना तो ख्वाब जैसा होता
है। लेकिन इन बच्चों की मेहनत को भाभा क्लासेज सुपर-35 (बी-35) ने उनकी
सलाहियत को पहचान कर निखारा और उन्होंने आईआईटी-जेईई का इम्तेहान पास
कर लिया। आमतौर पर इंजीनियरिंग वह भी आईआईटी -जेईई जैसे इम्तेहान में
खाए पिए घर के लड़के ही कामयाबी हासिल करते रहे हैं क्योंकि मोटी ट्यूशन
और कोचिंग फीस बर्दाश्त करना सबके बस की बात नहीं होती है। मगर बिहार
के रहमानी-30, आनंद कुमार के सुपर-30 के तर्ज पर कानपुर में भाभा
क्लासेज सुपर-35 (बी-35) ने गरीब और बसलाहियत बच्चों को अपनी कोचिंग की
भट्टी में तपा कर कुंदन बना दिया और आज उन बच्चों की कामयाबी पर पूरे
मुल्क के लोगों को हैरत आमेज खुशी हो रही है।
जो काम आनंद कुमार का सुपर-30 और बी-35 कर रहे हैं वही काम बिहार की
खानकाह रहमानी मुंगेर भी अंजाम दे रही है और रहमानी-30 के तहत गरीब और
बसलाहियत बच्चों को आईआईटी, सीए और दूसरे इम्तेहानात की तैयारी कराई
जाती है और कामयाब तलबा की तालीम का खर्च भी उठाया जाता है। इसी तरह की
कोचिंग भाभा क्लासेज के बी-35 ने कराई और गरीब बच्चों ने कामयाबी के
झण्डे गाड़ दिए। इस कोचिंग में पढ़ कर जिन बच्चों ने कामयाबी हासिल की
उनमें से कोई अखबार बेंचकर पढ़ाई कर रहा था तो कोई पंचर जोड़ कर, किसी के
वालिद ट्रक ड्राइवर थे तो किसी के मजदूर। लेकिन इन सभी की आंखो में एक
ख्वाब पल रहा था कि उनका बेटा पढ़ लिख कर बड़ा आदमी बन जाए और उसे मजदूरी
ना करना पड़े, ट्रक ना चलाना पड़े या फलों का ठेला ना लगाना पड़े। उनकी
औलादों ने अपने वाल्दैन का ख्वाब पूरा किया और बी-35 ने इस ख्वाब को
ताबीर दी। आज जब तालीम एक तिजारत में तब्दील हो गई है ऐसे में गरीब घर
के बच्चों का इंजीनियरिंग का इम्तेहान पास करना एक ठंडी हवा के झोंके
की तरह लगता है जो राहत पहुंचाता है।
जिन लड़कों ने आईआईटी-जेईई का इम्तेहान पास किया उनकी माली हालत (आर्थिक
स्थिती) का पता इसी से लगाया जा सकता है कि आईआईटी में चार सौ चारवी
(404वीं) रैंक लाने वाले मनीष वर्द्दन के वालिद फैजाबाद में एक आरा
मशीन पर दिहाड़ी मजदूर हैं। जबकि महराजगंज में पीडब्ल्यूडी दतर के बाहर
फलों का ठेला लगाने वाले ओम प्रकाश के बेटे राहुल ने आईआईटी में पांच
सौ इकहत्तर (571वीं) रैंक हासिल की है। राहुल का इरादा एयरोस्पेस
इंजीनियर बनने का है। बनारस के शशांक मौर्य के वालिद बिस्कुट बेंचते
हैं उसने एक हजार एक सौ उन्तालीसवीं (1139वीं) रैंक हासिल की। इसी तरह
ग्वालियर के महराजपुर गांव में एक मामूली किसान के बेटे श्यामवीर ने
तीन सौ तैतालीसवीं (343वीं) पोजीशन हासिल की है। उरई में कागज की दुकान
में मजदूर के बेटे सौरभ वर्मा की एक हजार दो सौ उन्चासवी (1249वीं)
रैंक आई है जबकि उरई में ही आईआईटी में कामयाब होने वाले रोहित के
वालिद दूद्द बेंचते हैं। आठ सौ सत्तरवीं (870वीं) रैंक लाने वाले सुनील
के वालिद मजदूर है जो बलिया के कुराजी गांव में रहते हैं। अलीगढ़ के रहने
वाले सुशील के वालिद किसान हैं। बिहार के नालंदा में सौरभ के वालिद
मसाले की चक्की चलाते हैं। ललितपुर के नारायन पाल जब पांच बरस का था तभी
उसके वालिद का इंतकाल हो गया था। सरकारी स्कूल से आंठवा दर्जा पास करने
के बाद उसने अपनी तालीम आगे जारी रखने के लिए पंचर बनाने की दुकान खोल
ली। उसकी मेहनत रंग लाई और अब पंचर बनाने वाला इंजीनियर बनेगा। आदेश
कुमार के वालिद हॉकर हैं तो रोहित गुप्ता के वालिद जूते का डिब्बा बनाते
हैं।
इंजीनियरिंग के इम्तेहान में एक सौ पचासवीं रैंक लाकर मैकेनिकल
इंजीनियर बनने का इरादा रखने वाले निश्चय चौरसिया के वालिद प्रदीप
चौरसिया कुशीनगर के तरिया सुजान गांव में पान की दुकान चलाते हैं।
कानपुर के साकेतनगर में घड़ी की दुकान चलाने वाले पुरूषोत्तम दास के बेटे
गिरीश कुमार ने इंजीनियरिंग के इम्तेहान में कामयाबी हासिल की। बांदा
के प्रभाकर के वािलद के पास सिर्फ पांच बीघा जमीन है। द्दर्मपाल यादव
के वालिद ट्रक ड्राइवर हैं, जितेन्द्र सिंह के वालिद सड़क पर छोले भटूरे
बेंचते हैं। उज्जवल के वालिद दूद्द बेंचते है तो प्रियंका शर्मा के
वालिद मोबाइल रिपेयरिंग का काम करते हैं। मैनपुरी के निखिल अग्र्रवाल
के वालिद की मोबाइल रिचार्ज की दुकान है। यह वह बच्चे हैं जिन्होंने
तालीमके लिए मुश्किलात के पहाड़ का सीना चीर कर कामयाबी की नहर निकाली
है।
इन गरीब बच्चों को सुपर-30 और बी-35 का सहारा मिला तो आसमान में परवाज
करने लगे। बी-35 यानि भाभा क्लासेज सुपर 35 ने दो साल पहले उन सलाहियतों
को तलाश करके निखारने का काम शुरू किया जो सहूलतों के फुकदान (अभाव)
में दम तोड़ देती है। इस गु्रप के चेयरमैन महेश सिंह चौहान ने बताया कि
बी-35 में सेलेक्शन के लिए छः जून 2010 को मुल्क के ग्यारह बड़े शहरों
में इम्तेहान कराया था जिसमें छः हजार बच्चे शरीक हुए इनमें से पच्चीस
को बी-35 के लिए चुना गया था। उन्होंने कहा कि आठ बच्चे सुपर-30 में चले
गए थे और दो बीमार हो गए थे इसलिए पैंतीस के बजाए पच्चीस बच्चे ही आए।
इस कोचिंग में बच्चों को मुत रहने और खाने के अलावा कोचिंग की सहूलत भी
मुत में ही फराहम की जाती है। महेश सिंह चौहान ने सभी कामयाब तलबा की
चार साल की कुल फीस की रकम छिहत्तर लाख अस्सी हजार रूपया पहले ही अदा
कर दिया। ताकि इन बच्चों की पढ़ाई का बोझ इनके घर वालों पर ना पड़े।
आईआईटी-जेईई में गरीब घर के बच्चों ने कामयाबी हासिल करके बता दिया कि
सलाहियत किसी की मीरास नहीं हैं।
चार्टर्ड अकाउंटेट और इसके इमकानात
एजाज अख्तर, पूणे, महाराष्ट्र
चार्टर्ड अकाउंटेंसी (सीए) क्या है? इसके लिए क्या मौके हैं? मुस्तकबिल
में इस तालीम की क्या अहमियत है? क्या यह कोर्स बहुत मुश्किल है? क्या
साइंस के तलबा सीए कर सकते है? क्या उर्दू मीडियम के तलबा सीए कर सकते
है? चार्टर्ड अकाउंटेंसी यानी सीए तालीम व तर्बियत का एक ऐसा कोर्स है
जिसे इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंस आफ इंडिया (आईसीएआई) नई दिल्ली
कराती है।
आईसीएआई उन्नीस सौ उनचास में मरकजी सरकार का कायम कर्दा एक इदारा है।
यह वाहिद इदारा है जिसे पूरे हिन्दुस्तान में सीए करने का अख्तियार है।
इसके इम्तहान में कामयाब होने के बाद सीए की डिग्री मिलती है। जहीन और
मेहनती तलबा दसवीं क्लास के बाद भी दाखिला ले सकते हैं। ऐसी सूरत में
उन्हें बारहवीं के इम्तहान में कामयाबी हासिल करने के बाद सीपीटी का
इम्तहान देने का मौका मिल सकता है।
इस कोर्स में खासतौर पर अकाउंटेंसी (खाताबही), आडिटिंग (खाताबही को
जांचना), कोस्टिंग और मुख्तलिफ टैक्स तिजारत के कानून शामिल हैं। सीए
का कोर्स साढ़े चार साल का है। इसके तीन हिस्से हैं। 1. सीपीटी (कामन
प्रोफिसिएंसी टेस्ट), 2. आईपीसीसी (इंटीग्रेटेड प्रोफेसनल कम्पीटेंस
कोर्स), 3. फाइनल।
चार्टर्ड अकाउंटेंट बनाने के लिए ऊपर लिखे तीनों इम्तहानात पास करने के
अलावा किसी सीए की निगरानी में तीन साल की ट्रेनिंग और आईसीएआई की
निगरानी में एक सौ घंटे की इंफारमेशन टेक्नोलाजी की ट्रेनिंग भी जरूरी
है।
सीए में दाखिला दसवीं (मैट्रिक) की बुनियाद पर ही हो जाता है लेकिन इसका
पहला इम्तहान सीपीटी का इम्तहान बारहवीं ($2) के बाद ही दिया जा सकता
है। इसलिए आमतौर पर बारहवीं में कामयाब तलबा ही इस कोर्स में दाखिला
लेते हैं। सीपीटी का इम्तहान आब्जेक्टिव होता है। इसमें चार सब्जेक्ट
होते हैं। 1. अकाउंटेंसी, 2. मैथ व स्टेटिस्टिक, 3. तिजारती कानून, 4.
इकोनामिक्स
सीपीटी के इम्तहान दो सौ नम्बरों पर मु
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