मौजूदा सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति)
प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का रिटायरमेंट नजदीक है। रिवायत के
मुताबिक उनसे भी मालूम किया गया कि रिटायरमेंट के बाद वह किसी
शहर में रहना पसंद करेंगी ताकि उनके लिए रिहाइश का बंदोबस्त
किया जा सके। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद पुणे में रहने की
ख्वाहिश जाहिर कर दी। पुणे में उनके लिए एक जगह बता कर वहां पर
उनके लिए मकान तैयार किया जाने लगा। बताना जरूरी है कि हमारे
मुल्क में किसी भी रिटायर्ड सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति) को
रिटायरमेंट के बाद उसकी मर्जी के शहर में रहने के लिए एक मकान,
स्टाफ और सफर की सहूलतों के साथ पेंशन भी मिलती है। अगर
रिटायर्ड सदर जम्हूरिया का इंतकाल हो जाए तो उनकी बीवी को
ताउम्र यही सहूलते मिलती हैं। प्रतिभा देवी सिंह पाटिल खुद
खातून हैं इसलिए अगर खुदा न खास्ता उन्होंने अपने शौहर देवी
सिंह पाटिल से पहले इस दुनिया को अलविदा कह दिया तो उनके शौहर
को ताउम्र स्पाउस की सहूलतें मिलेंगी या नहीं यह आने वाला वक्त
ही बताएगा। पुणे में प्रतिभा सिंह पाटिल के लिए सरकारी मकान
बनना शुरू हुआ काफी काम हो गया, सरकारी खजाने का लाखों रूपया
खर्च हो गया तभी एक रिटायर्ड फौजी ने इस मकान पर एतराज करते
हुए हंगामा खड़ा कर दिया। उनका कहना था कि जिस जगह पर सदर
जम्हूरिया के रिटायरमेंट के बाद रहने के लिए मकान बनाया जा रहा
है वह जगह फौज की है और उस जगह पर शहीद हो चुके फौजियों की
बेवाओं के रहने के लिए मकान बनाए जाने हैं। उनके कहने के
मुताबिक वह जगह फौजियों की बेवाओं के लिए महफूज (आरक्षित) हैं
इसी किस्म की बात साउथ मुंबई के कुलाबा में बनी आदर्श हाउसिंग
सोसाइटी के लिए कही गई थी। इस मामले में महाराष्ट्र सरकार के
उस वक्त के चीफ मिनिस्टर अशोक चाहवाण की कुर्सी चली गई, कई अहम
लोगों को जेल की हवा खानी पड़ी खूब हंगामा हुआ। उसके बाद
जुडीशियल तहकीकात की रिपोर्ट आई तो पता चला कि जिस जगह आदर्श
हाउसिंग सोसाइटी की आसमान छूती इमारत बनी है वह जमीन कारगिल
में शहीद हुए फौजियों की बेवाओं के लिए महफूज ही नहीं थी। हां
इस इमारत की बुलंदी में इजाफा और दीगर कुछ काम जाब्ते (नियम)
के खिलाफ जरूर हैं। फौजियों की बेवाओं के लिए जमीन के मामलात
चेन्नई, बंगलौर और जम्मू में भी इसी तरह उठाए जा चुके हैं।
फौजियों की शहादत और उनकी बेवाओं को सहूलतें दिए जाने की बात
करने से कब्ल हम यहां मुल्क के पहले वजीर तालीम मौलाना अबुल
कलाम आजाद के बयान का जिक्र करना जरूरी समझते है जो उन्होंने
फौजियों को खिताब करते हुए कहा था। इस बात का जिक्र हम पहले भी
कई बार कर चुके है। मौलाना ने फौजियों से कहा था कि ‘‘ आप फौज
की नौकरी करें या न करें यह बात पूरी तरह आपकी या मुल्क के किसी
भी नौजवान की मर्जी है। आप चाहें तो फौज में भर्ती हों, आप चाहें
तो किसी दूसरे मोहकमें की नौकरी में भी जा सकते हैं। इसलिए एक
बात आप सभी फौजियों को अच्छी तरह जेहन नशीन कर लेनी चाहिए कि
अगर आपने फौज में भर्ती होने का फैसला किया है और हिन्दुस्तानी
फौज का हिस्सा बनना पसंद किया है तो एक फौजी होने के नाते अपने
जिस्म और जान पर आपका कोई हक नहीं होगा फिर इन दोनों पर मुल्क
का हक होगा। आपकेा मुल्क के मफाद में अपनी जान और जिस्म दोनों
पेश करने पड़ सकते हैं।’’ मौलाना आजाद का बयान इस बात की वाजेह
(स्पष्ट) दलील है कि फौजी, मतलब हर वक्त देश पर मर मिटने के
लिए तैयार रहने वाली टीम। जैसे-जैसे वक्त गुजरा मुल्क के कई
हुक्मरानों ने फौज और फौजियों के जज्बात भड़काने का गुनाह किया।
यह गुनाह अपनी आखिरी मंजिल पर उस वक्त पहुंच गया जब पंडित अटल
बिहारी वाजपेयी की कयादत में मुल्क मंे एनडीए के बहाने आरएसएस
की सरकार बनी और सरकार की गलती व लापरवाई के नतीजे में कारगिल
की जंग हो गई। इस जंग में सरकार ने बुलट पू्रफ जैकेट और ‘‘स्नो
बूट’’ के बगैर ही फौजियों को मोर्चे पर भेज कर हजारों नौजवान
फौजियों को जान से हाथ द्दोने के लिए मजबूर कर दिया।
कारगिल में आद्दी अधूरी तैयारियों के साथ नौजवान फौजियों को
भेज कर उन्हंे मौत के मुुंह में ढकेलने के अपने जुर्म पर पर्दा
डालने के लिए ही उस वक्त की बीजेपी सरकार ने पूरे मुल्क में
शहीद फौजियों की अथर््िायों पर जम कर सियासत की और शहीद फौजियों
उनकी बेवाओं या घर वालों को बहुत ऊंचा दर्जा देेने का ढोंग किया।
तभी से फौजियों की बेवाओं के नाम पर एक नई सियासत शुरू हो गई
है। सवाल यह है कि अगर सरहद पर लड़ कर जान देेने वाला फौजी
शहीद होता है तो दहशतगर्दी और माओवादियों से मुल्क की हिफाजत
करने में सीनो पर गोली खाकर या बम और जमीनी सुरंग फटने के साथ
अपने जिस्म को टुकड़ो में कराने वाले सीआईएसएफ और पुलिस के
जवानों को क्या कहा जाना चाहिए। क्या मुल्क के लोगों की आराम
के लिए बिजली के खम्भों पर चढ़कर काम करते वक्त बिजली की चपेट
में आकर जान गंवाने वाला शहीद नहीं होता क्या वह सफाई
मुलाजिमीन देश और देश के लोगों पर शहीद नही होता जो सीवर लाइन
साफ करने के लिए अन्दर जाता है और जहरीली गैस का शिकार होकर कभी
वापस नहीं लौटता। क्या वह पुलिस वाले शहीद नहीं होते जो
क्रिमिनल्स और डाकुओं के साथ इनकाउंटर में अपनी जान गंवा देते
हैं। क्या वह बस और टेन ड्राइवर मुल्क के लिए शहीद नहीं होता
जो प्रदेश और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक बस और ट्रेन ले
जाते वक्त हादसे का शिकार हो कर अपनी जान गंवा देता है। फिर
शहादत का दर्जा सिर्फ फौजियों को ही क्यों दिया जाना चाहिए? यह
एक हकीकत है कि फौजी सरहदों पर बहुत मेहनत करते हैं, बहुत खराब
हालात में जिंदगी गुजारते हैं तो यह भी उतनी ही बड़ी हकीकत है
कि फौजियों को जितनी सहूलतें मिलती हैं उतनी सहूलतें मुल्क पर
जान देने वाले बाकी किसी को नहीं मिलती। फौजियों की शहादत को
अब बाकायदा ब्लैकमेलिंग और धंधा करने का जरिया बनाते हुए भी कई
लोगों को देखा जा सकता है। नोएडा के दो जवानों शशि शर्मा ने
सियाचिन में और विजेन्द्र थापर ने कारगिल में जान गंवाई थी। शशि
शर्मा के नाम पर सड़क चैराहे का नाम रख दिया गया विजेन्द्र
थापर के नाम पर जगहों को मंसूब करने के अलावा उनके वालिद वीएन
थापर को पेट्रोल पम्प भी दिया गया। थोड़े ही दिन बाद पता चला
कि इन दोनों फौजियों के वालिद यानि जेपी शर्मा और वीएन थापर ने
अपने विजिटिंग कार्डों पर अपने नाम के नीचे छपवाया शहीद
विजेन्द्र थापर और शहीद शशि शर्मा के वालिद इस तरह इन दोनों ने
तमाम सरकारी दफ्तरों में खूब हंगामें किए। अब अगर किसी फौजी की
शहादत की यही कीमत है तो इसे कुबूल नहीं किया जाना चाहिए। वैसे
भी आज के दौर में जंगों और लड़ाइयो की कोई गुंजाइश नही बची है।
इसलिए फौजियों के लिए अपनी शहादत देेने के मौके भी बहुत कम हो
गए हैं। अब तो फौजियों के मुकाबले सीआईएसएफ, सिविल पुलिस और
वार्डर सिक्योरिटी फोर्स जैसी फोर्सेज के जवान ही अक्सर मुल्क
के लिए शहादत देते रहते हैं इसलिए उनकी बेवाओं, उनके यतीम बच्चों
और बूढ़े वाल्दैन की फिक्र ज्यादा की जानी चाहिए। हमारा यकीन
है कि अगर कारगिल में वाजपेयी सरकार की मुजरिमाना लापरवाई न
होती तो शहीदों की बेवाओं के लिए इतना शोर न मचता। सन उन्नीस
सौ बासठ में चीन के साथ और आजादी के बाद से सन् इकहत्तर तक
पाकिस्तान के साथ लड़ी गई कई जंगों के बाद कभी भी फौजियों की
शहादत का ढोंग इस सतह पर नहीं रचा गया था।
फौजियों की बेवाओं के बहाने
मौजूदा सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति) प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का रिटायरमेंट नजदीक है। रिवायत के मुताबिक उनसे भी मालूम किया गया कि रिटायरमेंट के बाद वह किसी शहर में रहना पसंद करेंगी ताकि उनके लिए रिहाइश का बंदोबस्त किया जा सके। उन्होंने रिटायरमेंट के बाद पुणे में रहने की ख्वाहिश जाहिर कर दी। पुणे में उनके लिए एक जगह बता कर वहां पर उनके लिए मकान तैयार किया जाने लगा। बताना जरूरी है कि हमारे मुल्क में किसी भी रिटायर्ड सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति) को रिटायरमेंट के बाद उसकी मर्जी के शहर में रहने के लिए एक मकान, स्टाफ और सफर की सहूलतों के साथ पेंशन भी मिलती है। अगर रिटायर्ड सदर जम्हूरिया का इंतकाल हो जाए तो उनकी बीवी को ताउम्र यही सहूलते मिलती हैं। प्रतिभा देवी सिंह पाटिल खुद खातून हैं इसलिए अगर खुदा न खास्ता उन्होंने अपने शौहर देवी सिंह पाटिल से पहले इस दुनिया को अलविदा कह दिया तो उनके शौहर को ताउम्र स्पाउस की सहूलतें मिलेंगी या नहीं यह आने वाला वक्त ही बताएगा। पुणे में प्रतिभा सिंह पाटिल के लिए सरकारी मकान बनना शुरू हुआ काफी काम हो गया, सरकारी खजाने का लाखों रूपया खर्च हो गया तभी एक रिटायर्ड फौजी ने इस मकान पर एतराज करते हुए हंगामा खड़ा कर दिया। उनका कहना था कि जिस जगह पर सदर जम्हूरिया के रिटायरमेंट के बाद रहने के लिए मकान बनाया जा रहा है वह जगह फौज की है और उस जगह पर शहीद हो चुके फौजियों की बेवाओं के रहने के लिए मकान बनाए जाने हैं। उनके कहने के मुताबिक वह जगह फौजियों की बेवाओं के लिए महफूज (आरक्षित) हैं इसी किस्म की बात साउथ मुंबई के कुलाबा में बनी आदर्श हाउसिंग सोसाइटी के लिए कही गई थी। इस मामले में महाराष्ट्र सरकार के उस वक्त के चीफ मिनिस्टर अशोक चाहवाण की कुर्सी चली गई, कई अहम लोगों को जेल की हवा खानी पड़ी खूब हंगामा हुआ। उसके बाद जुडीशियल तहकीकात की रिपोर्ट आई तो पता चला कि जिस जगह आदर्श हाउसिंग सोसाइटी की आसमान छूती इमारत बनी है वह जमीन कारगिल में शहीद हुए फौजियों की बेवाओं के लिए महफूज ही नहीं थी। हां इस इमारत की बुलंदी में इजाफा और दीगर कुछ काम जाब्ते (नियम) के खिलाफ जरूर हैं। फौजियों की बेवाओं के लिए जमीन के मामलात चेन्नई, बंगलौर और जम्मू में भी इसी तरह उठाए जा चुके हैं।
फौजियों की शहादत और उनकी बेवाओं को सहूलतें दिए जाने की बात करने से कब्ल हम यहां मुल्क के पहले वजीर तालीम मौलाना अबुल कलाम आजाद के बयान का जिक्र करना जरूरी समझते है जो उन्होंने फौजियों को खिताब करते हुए कहा था। इस बात का जिक्र हम पहले भी कई बार कर चुके है। मौलाना ने फौजियों से कहा था कि ‘‘ आप फौज की नौकरी करें या न करें यह बात पूरी तरह आपकी या मुल्क के किसी भी नौजवान की मर्जी है। आप चाहें तो फौज में भर्ती हों, आप चाहें तो किसी दूसरे मोहकमें की नौकरी में भी जा सकते हैं। इसलिए एक बात आप सभी फौजियों को अच्छी तरह जेहन नशीन कर लेनी चाहिए कि अगर आपने फौज में भर्ती होने का फैसला किया है और हिन्दुस्तानी फौज का हिस्सा बनना पसंद किया है तो एक फौजी होने के नाते अपने जिस्म और जान पर आपका कोई हक नहीं होगा फिर इन दोनों पर मुल्क का हक होगा। आपकेा मुल्क के मफाद में अपनी जान और जिस्म दोनों पेश करने पड़ सकते हैं।’’ मौलाना आजाद का बयान इस बात की वाजेह (स्पष्ट) दलील है कि फौजी, मतलब हर वक्त देश पर मर मिटने के लिए तैयार रहने वाली टीम। जैसे-जैसे वक्त गुजरा मुल्क के कई हुक्मरानों ने फौज और फौजियों के जज्बात भड़काने का गुनाह किया। यह गुनाह अपनी आखिरी मंजिल पर उस वक्त पहुंच गया जब पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की कयादत में मुल्क मंे एनडीए के बहाने आरएसएस की सरकार बनी और सरकार की गलती व लापरवाई के नतीजे में कारगिल की जंग हो गई। इस जंग में सरकार ने बुलट पू्रफ जैकेट और ‘‘स्नो बूट’’ के बगैर ही फौजियों को मोर्चे पर भेज कर हजारों नौजवान फौजियों को जान से हाथ द्दोने के लिए मजबूर कर दिया।
कारगिल में आद्दी अधूरी तैयारियों के साथ नौजवान फौजियों को भेज कर उन्हंे मौत के मुुंह में ढकेलने के अपने जुर्म पर पर्दा डालने के लिए ही उस वक्त की बीजेपी सरकार ने पूरे मुल्क में शहीद फौजियों की अथर््िायों पर जम कर सियासत की और शहीद फौजियों उनकी बेवाओं या घर वालों को बहुत ऊंचा दर्जा देेने का ढोंग किया। तभी से फौजियों की बेवाओं के नाम पर एक नई सियासत शुरू हो गई है। सवाल यह है कि अगर सरहद पर लड़ कर जान देेने वाला फौजी शहीद होता है तो दहशतगर्दी और माओवादियों से मुल्क की हिफाजत करने में सीनो पर गोली खाकर या बम और जमीनी सुरंग फटने के साथ अपने जिस्म को टुकड़ो में कराने वाले सीआईएसएफ और पुलिस के जवानों को क्या कहा जाना चाहिए। क्या मुल्क के लोगों की आराम के लिए बिजली के खम्भों पर चढ़कर काम करते वक्त बिजली की चपेट में आकर जान गंवाने वाला शहीद नहीं होता क्या वह सफाई मुलाजिमीन देश और देश के लोगों पर शहीद नही होता जो सीवर लाइन साफ करने के लिए अन्दर जाता है और जहरीली गैस का शिकार होकर कभी वापस नहीं लौटता। क्या वह पुलिस वाले शहीद नहीं होते जो क्रिमिनल्स और डाकुओं के साथ इनकाउंटर में अपनी जान गंवा देते हैं। क्या वह बस और टेन ड्राइवर मुल्क के लिए शहीद नहीं होता जो प्रदेश और देश के एक कोने से दूसरे कोने तक बस और ट्रेन ले जाते वक्त हादसे का शिकार हो कर अपनी जान गंवा देता है। फिर शहादत का दर्जा सिर्फ फौजियों को ही क्यों दिया जाना चाहिए? यह एक हकीकत है कि फौजी सरहदों पर बहुत मेहनत करते हैं, बहुत खराब हालात में जिंदगी गुजारते हैं तो यह भी उतनी ही बड़ी हकीकत है कि फौजियों को जितनी सहूलतें मिलती हैं उतनी सहूलतें मुल्क पर जान देने वाले बाकी किसी को नहीं मिलती। फौजियों की शहादत को अब बाकायदा ब्लैकमेलिंग और धंधा करने का जरिया बनाते हुए भी कई लोगों को देखा जा सकता है। नोएडा के दो जवानों शशि शर्मा ने सियाचिन में और विजेन्द्र थापर ने कारगिल में जान गंवाई थी। शशि शर्मा के नाम पर सड़क चैराहे का नाम रख दिया गया विजेन्द्र थापर के नाम पर जगहों को मंसूब करने के अलावा उनके वालिद वीएन थापर को पेट्रोल पम्प भी दिया गया। थोड़े ही दिन बाद पता चला कि इन दोनों फौजियों के वालिद यानि जेपी शर्मा और वीएन थापर ने अपने विजिटिंग कार्डों पर अपने नाम के नीचे छपवाया शहीद विजेन्द्र थापर और शहीद शशि शर्मा के वालिद इस तरह इन दोनों ने तमाम सरकारी दफ्तरों में खूब हंगामें किए। अब अगर किसी फौजी की शहादत की यही कीमत है तो इसे कुबूल नहीं किया जाना चाहिए। वैसे भी आज के दौर में जंगों और लड़ाइयो की कोई गुंजाइश नही बची है। इसलिए फौजियों के लिए अपनी शहादत देेने के मौके भी बहुत कम हो गए हैं। अब तो फौजियों के मुकाबले सीआईएसएफ, सिविल पुलिस और वार्डर सिक्योरिटी फोर्स जैसी फोर्सेज के जवान ही अक्सर मुल्क के लिए शहादत देते रहते हैं इसलिए उनकी बेवाओं, उनके यतीम बच्चों और बूढ़े वाल्दैन की फिक्र ज्यादा की जानी चाहिए। हमारा यकीन है कि अगर कारगिल में वाजपेयी सरकार की मुजरिमाना लापरवाई न होती तो शहीदों की बेवाओं के लिए इतना शोर न मचता। सन उन्नीस सौ बासठ में चीन के साथ और आजादी के बाद से सन् इकहत्तर तक पाकिस्तान के साथ लड़ी गई कई जंगों के बाद कभी भी फौजियों की शहादत का ढोंग इस सतह पर नहीं रचा गया था।