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  Jadeed Markaz
Lucknow Urdu First Weekly Newspaper
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April 1-7

अतहर नबी ने लखनऊ में सजाई अदबी महफिलें

शबीहुल हसन नगमी
लखनऊ!
हिन्दी-उर्दू साहित्य अवार्ड कमेटी का तेइसवां इंटरनेशनल अदबी जलसा गुजिश्ता दिनों लखनऊ में हुआ जो तीन दिन तक जारी रहा। इस जलसे के दौरान एक बैतुल अकवामी मुशायरा हुआ। भीष्म साहनी और राजेन्द्र सिंह बेदी की फन और शख्सियात पर सेमिनार हुए और प्रदीप श्रीवास्तव का इंसाफ नाम का ड्रामा भी पेश किया गया। कमेटी के जनरल सेक्रेटरी अतहर नबी एडवोकेट और इस्तकबालिया कमेैटी के सदर सिराज मेंहदी की कोशिशों से लखनऊ के लोगों को तीन दिनों तक बेहतरीन अदबी नशिस्तों में शामिल होने का मौका मिला। पहले दिन रविन्द्रालय में मुशायरा हुआ जिसके मेहमाने खुसूसी की हैसियत से सुप्रीम कोर्ट के साबिक जज और प्रेस कौंसिल आफ इंडिया के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में जस्टिस की हैसियत से दिए अपने एक फैसले का जिक्र करते हुए उत्तर प्रदेश हुकूमत से कहा कि हिन्दुस्तान की दो अहम जुबानों के फरोग देने के लिए दर्जा तीन से दर्जा सात तक संस्कृत और उर्दू को लाजिमी तौर पर पढ़ाया जाना चाहिए। इस मौके पर दीगर दो मेहमाने खुसूसी रियासती वजीर फरीद महफूज किदवई और लखीमपुर से लोकसभा मेम्बर व साबिक रियासती वजीर जफर अली नकवी ने भी उर्दू के सिलसिले में अपने ख्यालात का इजहार किया।

तीन रोजा तेइसवे अदबी मेले में पहले दिन पच्चीस मार्च को रविन्द्रालय चारबाग में मुशायरा व कवि सम्मेलन हुआ। जिसमें हिन्दी और उर्दू के बारह अदीबों (साहित्यकारों) को एजाज (सम्मान) भी दिया गया। जिन अदीबों को एजाज से नवाजा गया उनमें डाक्टर अब्दुल्लाह बिस्मिल, प्रोफेसर इन्द्रनाथ चैधरी, डाक्टर सूर्य प्रसाद दीक्षित और डाक्टर पूरन चंद टंडन को ‘‘साहित्य शिरोमणि सम्मान’’ दिया गया। ‘‘साहित्य श्री सम्मान’’ एसएन लाल और राजेन्द्र पंडित को दिया गया जबकि लखनऊ यूनिवर्सिटी के सदर ए शोबा-ए-उर्दू शायर व नक्काद डाक्टर अनीस अशफाक आब्दी, नवाब आरजू, केवल धीर, काजी लताफत हुसैन और डाक्टर नुसरत नाहीद को उर्दू साहित्य अवार्ड दिया गया। इस मौके पर तकरीर करते हुए जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने प्रोग्राम में शरीक रियाासती वजीर फरीद महफूज किदवई से कहा कि दर्जा तीन से दर्जा सात तक उर्दू और संस्कृत को लाजिमी करार दिए गए 1994 के उनके फैसले को वजीर-ए-आला से कह कर लागू कराइए। इसके बाद उन्होंने शायरों को खिताब करते हुए कहा कि मुश्किल लफ्जों के बजाए आसान जबान में शेअर कहे जाए। उर्दू को आसान बनाएं। उन्हांेने कहा कि नजीर अकबराबादी की तरह अवाम की शायरी कीजिए। महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी जैसे मसायल को शायरी का मौजू (विषय) बनाइए। उन्होंने मुशायरों के रातभर चलने की रिवायत पर भी एतराज किया।

इसी दौरान इलेक्ट्रानिक मीडिया को भी जस्टिस काटजू ने नसीहत दे डाली। उन्होंने अन्ना हजारे के बारे में कहा कि उनके पास साइंसी सोंच नहीं है सिर्फ शोर मचाने से कुछ नहीं होने वाला। उन्होंने कहा कि जबाने रोजगार से दूर हो गई है इसलिए मिटती जा रही हैं। वह कहते हैं कि हमारे पुरखे भी उर्दू ही बोलते थे मगर अब मुसलमानों के बच्चे भी उर्दू बोलते नजर नहीं आते। प्रोग्राम में बतौर मेहमाने खुसूसी शरीक हुए लखीमपुर से कांग्रेस के लोकसभा मेम्बर जफर अली नकवी ने अतहर नबी की कोशिशों को सराहते हुए लखनऊ की गंगा-जमीन तहजीब पर रौशनी डाली। इसके बाद हुए मुशायरे में जिन शायरों ने अपना कलाम पेश किया उनमें डाक्टर मलिक जादा मंजूर, वसीम बरेलवी, विष्णु सक्सेना, अनीस अंसारी, सुमन दुबे, केवल धीर, खुशबीर सिंह शाद, जौहर कानपुरी, शबीना अदीब, रईस अंसारी, हसन काजमी, सूर्य कुमार पाण्डेय, राजेन्द्र पंडित, मुकुल महान, वाहिद अली वाहिद, सर्वेश अस्थाना, नसीम निकहत, ताजवर सुल्ताना, बशीर फारूकी, तारिक कमर, उस्मान मीनाई, हाशिम फिरोजाबादी, सबा बलरामपुरी और नायाब हल्लौरी के नाम खुसूसी अहमियत के हामिल हैं। मुशायरे की निजामत शायर अनवर जलालपुरी ने की थी।

मुशायरे के अगले रोज छब्बीस मार्च को राय उमानाथ बलि के जयशंकर प्रसाद सभागार में मशहूर अदीब भीष्म साहनी के फन और शख्सियत पर एक सेमिनार प्रोफेसर इन्द्रनाथ चैधरी की सदारत में हुआ जिसमें मशहूर थियेटर आर्टिस्ट व डायरेक्टर नादिरा बब्बर बतौर मेहमाने खुसूसी शरीक हुईं। भीष्म साहनी के फन और शख्सियत पर अपने ख्यालात का इजहार करते हुए उनसे अपनी मुलाकातों का जिक्र किया। नादिरा बब्बर ने कहा कि भीष्म साहनी काफी संजीदा रहते थे, उन्हांेने जो लिखा बेहतरीन लिखा ड्रामे तो जबरदस्त लिखे। उनके ड्रामे आज भी लोगों की जुबां पर है और लम्बे अर्से तक रहेंगे। उन्होंने कहा कि ‘‘हानूश’’ और ‘‘कबीरा खड़ा बाजार में’’ आलमी सतह के ड्रामे हैं। ‘‘तमस’’ उनका बेहतरीन नावेल है जिस पर टीवी सीरियल भी बन चुका है। नादिरा ने अदीबों और फनकारों में पाई जाने वाली खेमेबाजी को नुक्सानदेह बताया।
प्रोग्राम की सदारत कर रहे प्रोफेसर इन्द्रनाथ चैधरी ने कहा कि भीष्म साहनी कम्युनिस्ट रूजहान रखते थे और यह पसंद सियासी ना होकर नजरियाती व इल्मी थी। इसीलिए उन्होंने कम्युनिज्म को अपने तरीके से अपनाया। हिन्दी और उर्दू जबानों (भाषाओं) का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा दोनों जबाने साथ चलकर काम करें तो नतीजे बेहतर होंगे। भीष्म साहनी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अपनी तखलीकात से उन्हांेने गराकंद्र खिदमात अंजाम दी। उन्हांेने कहा कि उर्दू शायरी में जो मजा है वह किसी दूसरी शायरी में नहीं है। प्रोफेसर इर्तिजा करीम ने कहा कि सज्जाद जहीर ने लोगों और जबानों को जोड़ने का काम किया मगर आज लोग अपनी-अपनी अलग दुकान चला रहे हैं। वह सवाल करते हैं कि आज तरक्की पसंद लोग कहां है? डाक्टर अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि भीष्म साहनी की तहरीरें बड़ी बामकसद हुआ करती थी। उन्होंने कहा कि यह भीष्म साहनी ही थे जिन्होंने तरक्की पसंद तहरीक को तमिल व दीगर जबानों तक पहुंचाया था। एफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन से जुड़कर उन्होंने 1987 में एक बड़ा सेमिनार कराया था। उन्होंने कहा कि भीष्म सहानी का तमस जैसा नावेल तकसीम (विभाजन) के ऊपर लिखी जाने वाली तहरीरों में एक संगेमील की हैसियत रखता है।

शकील सिद्दीकी ने कहा कि जिस तरह भीष्म साहनी की तहरीरें उनकी शख्सियत की तरह फितरी हुआ करती थी जबानों को जोड़ने का जो काम सज्जाद जहीर ने किया उसे भीष्म साहनी व कमला प्रसाद ने मजबूती दी। डाक्टर मंजीम साहा ने कहा कि वह सभी जबानों के हामी थे। उन्होंने भीष्म साहनी के छः ड्रामों रंग दे बसंती चोला, मुआवजा, माधवी, हानूश, आलमगीर और कबीरा खड़ा बाजार में का जिक्र करते हुए अपने तास्सुरात पेश किए। प्रोफेसर गंगा प्रसाद विमल, पंकज प्रसून और डाक्टर माहे तिलअत ने भी अपने ख्यालात का इजहार किया। प्रोग्राम के आखिरी दिन सत्ताइस मार्च को उसी जगह अफसाना निगार राजेन्द्र सिंह बेदी पर सेमिनार हुआ जहां एक दिन कब्ल भीष्म साहनी पर हुआ था। मौजू वही पुराना था ‘फन और शख्सियत’। प्रोग्राम की सदारत उर्दू के नक्काद प्रोफेसर शारिब रूदौलवी ने की थी। राजेन्द्र सिंह बेदी के ‘फन और शख्सियत’ पर अपने ख्यालात का इजहार करते हुए प्रोफेसर शारिब रूदौलवी ने कहा कि अगर यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि नई कहानी का आगाज राजेन्द्र सिंह बेदी से हुआ। उनकी कहानियों में नई कहानी के निशान नजर आने लगे थे। उनकी कहानियां पढ़ने से अंदाजा होता है कि तरक्की पसंद तहरीक से जुड़े होने के बावजूद उनके जेहन में यह तहरीक दूसरे तखलीककारों की तरह हावी नहीं थी। लखनऊ यूनिवर्सिटी के सदर-ए-शोबा-ए-उर्दू प्रोफेसर अनीस अशफाक आब्दी ने कहा कि राजेन्द्र सिंह बेदी और सआदत हसन मंटो दो ऐसे अफसानानिगार हैं जिनसे जिंदगी के फसाने को अफसाना बनाने का हुनर सीखा जा सकता था।

डाक्टर सबीहा अनवर ने बेदी पर अपने ख्यालात का इजहार करते हुए कहा कि गर्म कोट की शम्मी हो या लाजवत की राजो बेदी की कहानियां हमारी जिंदगी की कहानियां हैं आज भले ही किरदार बदल जाएं मगर मसायल वहीं रहेेंगे। उनके किरदार सोते जेहनों को झिझोंड कर जगा देते हैं। शाहनवाज कुरैशी ने बेदी और मेयारे जबान पर कहा कि उनकी जबान में लखनवी चाशनी ढूंढना बेमानी है। उनका कहना था कि बेदी ने फन और जबान दोनों से लोहा लिया था। कुतुबल्लाह ने कहा कि बेदी का अपना अलग फन है, वह अवाम के सताए चेहरों को महसूस करते और उनका साथ देते थे। आयशा सिद्दीकी ने गर्म कोट के हवाले से अपनी बात कही। डाक्टर मलिक जादा मंजूर अहमद ने कहा बेदी मंटो और कृष्ण चंदर जैसे तखलीककारों की बदौलत उर्दू अदब आलमी सतह के अदब का हिस्सा है। उर्दू-अरबी- फारसी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर अनीस अंसारी ने कहा बेदी के काम में शोरगुल नहीं है वह बड़ी खामोशी से अपना काम करते हैं।

अलीगढ़ से आए शाफेअ किदवाई ने बेदी की नावेल ‘‘एक चादर मैली सी’’ के हवाले से अपनी बात कही। आबिद सुहैल ने कहा कि बेदी की कहानियां उर्दू की बेस्ट कहानियों में रखे जाने की हकदार हैं। प्रोफेसर वारिस किरमानी ने भी माना कि बेदी को कुछ अफसाने आलमी सतह के हैं। सेमिनार की निजामत कर रहे दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इर्तिजा करीम ने बताया कि बेदी ने ‘मोहसिन लाहौरी’ के नाम से लिखने की श्ुरूआत की थी। उन्होंने कहा कि बेदी ने अदब के साथ फिल्मी दुनिया में भी अपनी कलम के जौहर दिखाए तो मुंबई से आए शफीक अहमद ने फिल्म दाग, मिर्जा गालिब, देवदास, सत्यकाम और मधुमति जैसी फिल्मों के हवाले से बेदी पर गुफ्तगू की। दिल्ली के इस्मत कादरी ने कहा कि वह प्रेमचंद के बाद बेदी को ही बड़े अफसाना निगारों मंे शुमार करते हैं। इनके अलावा शबनम अकबर, डाक्टर फरहत यासमीन वगैरह ने भी अपने ख्यालात का इजहार किया। इसके अगले रोज ‘‘इंसाफ’’ नाम का ड्रामा खेला गया। तीन दिनों तक लखनऊ में चले अदबी मेले से शहर की अदबी फिजा में अदब और शायरी का चर्चा रहा।

Jan 15-21
उर्दू दुनिया एक अहम तजकिरा निगार से महरूम

नुमाइंदा मरकज़
लखनऊ!
पिछले दिनों उर्दू दुनिया खासकर लखनऊ के अदबी हलके एक अहम तहजीबी और अदबी शख्सियत से महरूम हो गए। यह अहम शख्सियत थी इरफान अब्बासी की जिन्होंने अपने कलम से लम्बे अर्से तक उर्दू की खिदमत की और उत्तर प्रदेश के बेशुमार मारूफ और गैर मारूफ यहां तक कि बहुत से गुमनाम शायरों और अदीबों के तजकिरे लिखकर उनके कामों को आने वाली नस्लों के लिए महफूज कर दिया। उन्होंने बहुत सारे लोगों पर खाके लिखे, मुख्तलिफ मौजूअ पर मजामीन लिखे लेकिन जिस लगन और मुस्तकिल मिजाजी के साथ उन्होंने तजकिरानवीसी को अपना शगल बनाया उसकी कोई और मिसाल इस जमाने में नहीं मिलती। एक जमाना था जब तजकिरा को इल्मी व अदबी दुनिया में खास अहमियत दी जाती थी। हमारी जबान के कई बड़े शायरों ने तजकिरे लिखकर अपने जमाने और उससे पहले की बड़ी शख्सियतों को महफूज किया है। लेकिन तजकिरे की जगह द्दीरे-द्दीरे जब तंकीद ने ले ली और तंकीद ही हर तरफ छा गई तो तजकिरा नवीसी का फन अजकार रफ्ताफन होकर रह गया। इस एतबार से देखा जाए तो इरफान अब्बासी ने कई जिल्दों में तजकिरा-ए-शोअरा उत्तर प्रदेश जैसा अहम काम करके एक पुराने फन को नए सिरे से जिन्दा किया। यह ऐसा काम है जिसके लिए उन्हें याद रखा जाएगा। इरफान अब्बासी ने लम्बी उम्र पाई। इंतकाल के वक्त उनकी उम्र तकरीबन नव्वे बरस के आसपास थी। इद्दर काफी अर्से से वह बीमार चल रहे थे और बिस्तर पर थे। इसके बावजूद तहकीकी और अदबी कामों का सिलसिला जारी था। अदब और शायरी उन्हें एक तरह से विर्से में मिली थी। उनके वालिद हजरत सोज बाराबंकवी एक मारूफ शायर थे। उनके छोटे भाई डाक्टर सलमान अब्बासी मरहूम बहैसियत एक अदीब के लखनऊ के अदबी हलकों में बेहद मकबूल थे। इरफान अब्बासी ने इब्तिदा में अफसाने लिखे और शायरी भी की। वह मुशायरों, शेअरी, नशिस्तों और अदबी जलसों में बाकायदगी से शिरकत करते थे। बेश्तर शायरों और अदीबों से उनके जाती रिश्ते थे। इसी बुनियाद पर उन्होंने बहुत सी मारूफ और गैर मारूफ शख्सियतों पर खाके लिखे जिन्हंे बहुत सराहा गया। उन्नीस सौ अट्ठहत्तर के आस पास उन्होंने शायरों और अदीबों के तजकिरे को अपना मिशन बना लिया और इस काम के लिए अपने को पूरी तरह वक्फ कर दिया और जिंदगी की आखिरी सांसों तक पूरी दिलचस्पी से इसी काम को करते रहे। उनकी लिखी किताबों की तादाद पचास से ऊपर थी। तजकिरा शोअरा उत्तर प्रदेश के अलावा ‘‘आप’’ के उनवान से तजकिरा-ए-शोअरा लखनऊ ‘‘आप थे’’ के उनवान से तजकिरा-ए-शोअरा कस्बात अवद्द और ‘‘आप हैं’’ के उनवान से उत्तर प्रदेश के उन शायरों का तजकिरा लिखा है जो किताब की इशाअत के वक्त जिंदा थे। इनके अलावा उनकी लिखी किताबों में ‘‘अनपढ़ शोअरा’’ उर्दू के मकबूल और खुदकुश शोअरा लखनऊ थे। हिन्दू शोअरा और शोअरा-ए-तंज व मजाह की भी खास अहमियत है।

Dec 25-31

खामोशी से गुजर गया शोला बयान शायर अदम गोण्डवी

शबीहुल हसन नगमी
लखनऊ!
रामनाथ सिंह ‘‘अदम’’ गोंडवी ने पूरी जिंदगी अपनी कलम के जरिए सिस्टम के खिलाफ जंग की और बड़े बेखौफ व बेबाक तरीके से अपनी शायरी के जरिए सियासत सिस्टम और समाज की खराबियों और बुराइयों को बयान करते रहे लेकिन अपनी जिन्दगी के आखिरी वक्त में वह खुद सिस्टम (व्यवस्था) की खराबी का शिकार हो गए। उन्हें लीवर सिरोसिस की बीमारी थी जिसके इलाज के लिए उन्हें बारह दिसम्बर को संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट में भर्ती कराया गया था लेकिन अस्पताल में चैबीस घंटों से ज्यादा वक्त गुजरने के बाद ना तो उनको सही बेड दिया गया और ना ही उनके बिस्तर की सफाई की गई जब अगले रोज शाम को समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव का फोन आया तो आनन-फानन में वह आम से खास मरीज हो गए और अस्पताल स्टाफ ने उनकी देखरेख और इलाज भी शुरू कर दिया। मुलायम सिंह ने उनके इलाज के लिए पचास हजार रूपए भी दिए थे। इसी अस्पताल में अदम गोंडवी ने अट्ठारह दिसम्बर को सुबह साढ़े पांच बजे आखिरी सांस ली और इस दुनिया से रूखसत हो गए। उनकी उम्र चैसठ साल थी उनके इंतकाल की खबर पाते ही समाजवादी पार्टी के मुखिया और प्रदेश के साबिक वजीर-ए-आला मुलायम सिंह यादव फौरन पीजीआई पहुंच गए और उन्हें खिराजे अकीदत पेश की। वजीर-ए-आला मायावती और गवर्नर बीएल जोशी ने भी उनके इंतकाल पर अफसोस जाहिर करते हुए इसे अदब का एक बड़ा नुक्सान बताया। अदम गोंडवी की आखिरी रसूम गोण्डा के उनके आबाई गांव आटा परसपुर में अदा की गई।

रामनाथ सिंह अदम गांेडवी गोण्डा के आटा परसपुर गांव में बाइस अक्टूबर 1947 को एक किसान के घर पैदा हुए थे। रामनाथ सिंह ने जब शायरी शुरू की तो अदम तखल्लुस रखा। उनका जेहन हमेशा समाज और सिस्टम में फैली हुई बुराइयों के खिलाफ एक बगावती जज्बा रखता था। उनके दिल में जो आग जल रही थी उसकी तपिश उनकी शायरी में साफ महसूस होती थी। यही वजह थी कि अदम ने पहली बार 1972 में भौरीगंज में जब गांव के उनवान से लिखी एक नज्म पढ़ी तो उसमें पाखंडी साधुओं पर गहरा तंज करते हुए कहा था कि ‘‘पढ़ रहा गीता प्रकटतः पर है अपने दांव में/ कि तने घर उजड़े हैं इसकी साधुता की छांव में ’’। इसके लिए उन्हें पहली बार पांच रूपए का ईनाम भी मिला था। अदम गोंडवी के दिल में जल रही आग की तपिश 1973 में भारत के अलावा बीबीसी हिन्दी सर्विस के जरिए लंदन तक में महसूस की गई। दरअस्ल अदम जिस गांव में रहते थे वह दबंगों की दहशत में था। गांव के दबंग जब चाहते किसी भी गरीब या दलित की बहू-बेटी को उठा लेते और अपनी हवस मिटाते। 1973 में गांव के दलित हरखू की बेटी कृष्णा के साथ ऐसा ही शर्मनाक वाक्या पेश आया उस वक्त गांव के सभी लोग खौफ से खामोश रहे मगर अदम गोंडवी की कलम बोल पड़ी और उन्होंने मुल्क के अदीबों और सियासतदानों को मुखातिब करते हुए कहा ‘‘आइए महसूस करिए जिन्दगी के ताप को/ मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको’’। इसी नज्म ने अदम को पूरे मुल्क क्या दुनिया में मशहूर कर दिया, उनकी नज्म ‘‘चमारों की गली’’ अमृत प्रभात में छपी, बड़ा हंगामा हुआ और आखिरकार दलित की बेटी की आबरू लूटने वाले दरिंदों को कटघरे में भी खड़ा होना पड़ा।

अदम गोंडवी ने अपनी शायरी में समाज के उस दबे कुचले कमजोर आदमी के मसायल को पूरी शिद्दत से बयान किया जिसका चेहरा भीड़ में पहचाना भी नहीं जा सकता। यह अदम गोंडवी का ही कमाल था कि वह गजल को माशूक के जलवों से निकाल कर बेवा के माथे की शिकन तक लाए। अदम गोंडवी भी मुशायरों और कवि सम्मेलनों की उस सियासत का शिकार रहे जहां गलेबाज लतीफेबाज और ड्रामा करके शेअर पढ़ने वाले हजारों रूपए लेते थे जबकि अदम जैसे सीधे सादे लोगों को आने जाने का किराया भी मुश्किल से मिलता। वह पैसे मांग भी नहीं सकते थे क्योंकि इसमें उनकी खुद्दारी रूकावट थी। यही वजह थी कि अदम को मुशायरों और कवि सम्मेलनों में वाहवाही और दाद ओ तहसीन सबसे ज्यादा मिलती थी मगर मेहनताना या पढ़वाई जो भी कहें सबसे कम मिलती थी। इसके बावजूद उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और आम आदमी के मसायल को बयान करते हैं। वह कहते हैं ‘‘भूक के एहसास को शेरो सुखन तक ले चलो/ या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो’’/ जो गजल माशूक के जलवो से वाकिफ हो गई/ उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।’’ या कभी कहते है ‘‘जुल्फ, अंगडाई, तबस्सुम, चांद, आईना, गुलाब/ भुकमरी के मोर्चे पर ढल गया इनका शबाब।’’

अदम गोंडवी के बारे में कहा जाता था कि वह कपड़ा जरूर मोटा पहनते थे मगर बात बहुत महीन कहते थे। उनकी शायरी में जो तंज होता था वह सिर्फ चुभता ही नहीं था बल्कि खराश भी डाल देता था और यह खराश खलिश बन कर दिल को सालती रहती थी। उनके लफ्जों में तलवार की तरह धार होती थी तभी तो उन्होंने कहा ‘‘बर्गे गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी गजल’’ अदम सिर्फ लफ्ज को तलवार बनाना ही नहीं जानते थे बल्कि उससे वार करने का हौसला भी उनमें था। आज भी मुल्क में हजारों करोड़ के घपले घोटाले सामने आ रहे हैं और ग्लोबलाइजेशन की खुलेआम हिमायत हो रही है। हर घपले घोटाले में सियासतदानों के नाम आ रहे हैं और कई सियासतदां जेल में भी है। इस सबके मद्देनजर अदम की काफी पहले लिखी एक नज्म बिल्कुल सटीक नजर आती है जिसमें वह कहते हैं।‘‘ जो डलहौजी ना कर पाया वो ये हुक्मरान कर देंगे/ कमीशन दो तो हिन्दुस्तान को नीलाम कर देंगे/सदन में घूस देकर बच गई कुर्सी तो देखोगे/ ये अगली योजना में घूसखोरी आम कर देंगे।’’ इसके अलावा बाढ़ या किसी भी कुदरती आफात के दौरान राहत रसानी के काम में जो घपले नौकरशाह करते हैं उन पर तंज करते हुए अदम ने लिखा ‘‘मिसेज सिन्हा के हाथों मंे जो बेमौसम खनकते है/ गुजिश्ता बाढ़ के तोहफे है ये कंगन कलाई के।’’

अदम खालिस शायर थे हिन्दी और उर्दू में उन्हें यकसां मकबूलियत हासिल थी मौजूदा दौर में ऐसी मकबूलियत किसी के हिस्से में नजर नहीं आती है। उन्हें हिन्दी वालों ने सीने से लगाया तो उर्दू वालों ने उन्हें सर-माथे पर बिठाया। उनके शायरी के मजमूए ‘‘समय से मुडभेड़’’ का दीबाचा लिखते हुए कैफ भोपाली ने उन्हें फिराक और मजाज के बराबर बताया था। अदम गोंडवी ने पूरी जिंदगी अपनी शायरी में आम आदमी के मसायल और उनके जज्बात की तर्जुमानी की और आम आदमी की तरह ही इस दुनिया से चले गए। उन्होंने शायरी को कभी अपनी रोजी रोटी का जरिया नहीं बनाया। इसीलिए वह हमेशा प्रोगण्डे से दूर रहे, ना वह पब्लिसिटी के पीछे भागे ना ही अपनी दूसरों से अपने लिए तारीफ की बैसाखियां मांगी। वह खालिस देसी अंदाज के शायर थे और गांव की बात ज्यादा करते थे। अंधेरे में डूबे गांव में बिजली के मसले पर तंज करते हुए वह नौकरशाहों से सवाल करते हैं। ‘‘जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में/ गांव तक वो रौशनी आएगी कितने साल में।’’ वह अदबी इदारों की सियासत से वाकिफ भी थे और नाराज भी तभी तो उन्होंने कहा कि ‘‘गजल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में/मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में।’’ अदम को दुष्यंत कुमार के तर्ज का शायर कहा जाता था शायद यही वजह है कि 1998 में उन्हंे मध्य प्रदेश सरकार ने दुष्यंत कुमार अवार्ड से नवाजा।

अदम का लिखा एक शेर खुद उनकी अपने हालत की अक्कासी करता है जिसमें वह जुम्मन के घर में फूटी रकाबी का जिक्र करते हैं। अदम गोंडवी के सर नेशनल बैंक का तकरीबन डेढ़ लाख रूपए कर्ज था जिसे वह मरते दम तक चुका नहीं सके और साठ रूपयों के एवज में अपनी बीस बीघा जमीन गिरवी रखी थी उसे भी वह मरते दम तक छुड़ा नहीं सके। उनका दुनिया से चला जाना एक शायर का चला जाना नहीं बल्कि आम आदमी की आवाज का खामोश हो जाना है। उनकी गजलों और कविताओं का मजमुआ ‘‘ समय से मुडभेड़’’ और ‘‘धरती की सतह पर’’ काफी मशहूर हुआ। आज अदम हमारे बीच नहीं है मगर उनक यह शेर हमेशा उनकी मौजूदगी का एहसास कराता रहेगा। जिसमें वह कहते हैं कि ‘‘फटे कपड़ों में तन ढाके गुजरता हो जिधर कोई/समझ लेना वो पगडंडी अदम के गांव जाती है।’’

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